पप्पू : टीचर से सर यह बताएं कि वाटर लेवल कैसे बढ़ता है।
Qno1मेडल के अनुवांशिकी संबंधी प्रयोगों की सफलता के मुख्य क्या कारण थे ?
Ans. मेडल द्वारा अनुवांशिकी प्रयोगों के लिए मटर (Pisum Sativurm) के पौधे का चयन किया गया जो सफलता का मुख्य कारण हुआ, क्योकि
(1)मटर के पौधे में विपरीत गुणों के कई जोड़े पाये जाते हैं।
(2) इनका जीवन चक्र कुछ ही महीनों का होता है जिसके कारण संतति के गुणों के अध्ययन में कम समय लगता है।
पुमंग तथा जायांग ही स्थिति कृत्रिम पर-परागण के लिए अनुकूल होती है।
• अध्ययन के लिए चयनित गुण संयोग से अलग-अलग गुणसूत्रों पर अवस्थित थे. जिसके कारण अनुवांशिक गुणों के परिणामों में कोई व्यवधान नहीं हो सका।
Qno2मेंडल द्वारा प्रयोगों के लिए मटर के पौधे चुनने का क्या लाभ हुआ?
मेंडल द्वारा प्रयोग में लिए गए मटर के पौधे चुनने का निम्नलिखित लाभ हुए हैं!
(1) 1 साल वाले पौधे आसानी से बगीचों में उगाए जा सकते हैं
(2) इसमें विभिन्न लक्षणों के वैकल्पिक रूप देखने को मिले हैं!
(3) नर और मादा एक ही में मिल जाते हैं
(4) यह पौधा और मानसिक रूप से शुद्ध और पीढ़ी दर पीढ़ी इसके पौधे शुद्ध बने रहते हैं!
मेंडल के वंशागति के नियम
उन्नीसवीं सदी के मध्य के वर्षों में ही आनुवंशिक
को समझने के संबंध में प्रगति हो सकी। ग्रीगोर मेंड
ने उद्यान मटर के पौधे में सात वर्षों (1856-1863)
तक संकरण के प्रयोग किए तथा उनके आधार :
जीवों की वंशागति नियम को प्रस्तावित किया।
सांख्यक विश्लेषणों और गणितीय तर्कशास्त्र का जीव विज्ञान कसमस्याओं के समाधान हेतु प्रथम उपयोग भी में द्वारा वंशागत अंवेषणों के दौरान ही किया गया उनका
प्रयोगों में नमूनों की विशाल संख्या ने उनके आँकड
को विश्वसनीयता प्रदान की।
साथ ही उनके परीक्षाधीन पौधों की उत्तरोत्तर पीढ़ियों पर किए गए प्रयोग तथा उनके सफल निष्कर्षों ने सिद्ध किया कि मेंडल के वंशागति नियमों में व्यापकता थी और वे केवल मेंडल ने मटर के पौधे के उन लक्षणों
पर विचार किया जो सर्वथा विपरीतार्थ थे;
जैसे लंबे या बौने पौधे, पीले या हरे बीज। इसके कारण उसे वंशागति नियमों का आधारभूत ढाँचा तैयार करने में सहायता मिली। बाद के वैज्ञानिकों ने इसे विस्तार दिया जिससेविविध नैसर्गिक घटनाओं और उनमें निहित जटिलता का स्पष्टीकरण किया जा सका। मेंडल ने अनेक तद्रूप-प्रजनन-सम, मटर के शुद्ध वंशक्रमों को लेकर कृत्रिम परागण/ पर-परागण के प्रयोग किए तद्रूप-]
प्रजनन-सम (टू ब्रीडिंग) वंशक्रम वह होता है
, जो कई पीढ़ियों तक स्वपरागण के फलस्वरूप स्थायी विशेषक (ट्रेट) प्रदर्शित करता है। मेंडल ने मटर की 14 तद्रूप प्रजननी मटर की किस्मों को छाँटा अर्थात् सात जोड़े विपरीत लक्षणों को लिया. इनके अन्य लक्षण समान थे। इनमें से कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं चिकने या झर्रीदार बीज, पीले या हरे बीज, चिकनी या फूली हुई फलियाँ, हरी या पीली फलियाँ, लंबे या बौने
की वंशागति मेंडल ने वंशागत के अध्ययन के लिए एक प्रयोग में मटर के लंबे तथा बौने पौधे का संकरण किया। इस प्रयोग द्वारा एक जीन का आनुवंशिक अध्ययन किया
गया। इस संकरण से उत्पन्न बीजों को उगाकर उन्होंने
प्रथम संकर पीढ़ी के पौधे प्राप्त किए
(चित्र 5.2)।इस पीढ़ी को प्रथम संतति पीढ़ी (फिलिअल,प्रोजेनी) या भी कहा जाता है। मेंडल ने देखा कि पीढ़ी के सभी पौधे लंबे थे अर्थात् अपने लंबे जनक के समान थे, !
कोई पौधा बौना नहीं था (चित्र 5.2) । इसी
प्रकार के परिणाम अन्य विशेषकों वाले संकरण प्रयोगों
में भी पाए गए। उन्होंने देखा कि F
में दो में से एक;जनक के लक्षणों की ही अभिव्यक्ति होती है । दूसरे जनक के लक्षण प्रकट नहीं होते।
मेंडल ने फिर F के सभी लंबे पौधों को स्वयं परागित किया और उसे देखकर आश्चर्य हुआ कि F, पीढ़ी में प्रत्युत्पन्न कुछ पौधे बौने थे। जो लक्षण F, पीढ़ी में नहीं देखा गया, वह अभी प्रदर्शित हो गया।
बौने पौधों का अनुपात कुल F, पौधों का 25 प्रतिशत
था जबकि 75 प्रतिशत पौधे लंबे थे। लंबे और बौनेपन के लक्षण जनकों के समान ही थे और इनमें किसी प्रकार का सम्मिश्रण नहीं था। अर्थात् सभी या तो लंबे थे या बौने, मझोले कद के कोई भी नहीं थे (चित्र 5.3)।
जिन अन्य विशेषकों का अध्ययन किया उनसे भी इसी प्रकार के परिणाम प्राप्त हुए
अर्थात् F, पीढ़ी में केवल एक ही जनकीय लक्षण प्रकट हुआ जबकि F, पीढ़ी में दोनों
विशेषक 3 : 1 के अनुपात में अभिव्यक्त हुए। विपरीत विशेषकों में दोनों F, या F, स्तर पर किसी प्रकार का सम्मिश्रण नजर नहीं आया।




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