उत्तर-अलगू के फैसले ने अलगू-जुम्मन की दोस्ती की जड़ हिला दी। अब वे साथ-साथ बातें करते नहीं दिखाई देते। इतना पुराना मित्रतारूपी वृक्ष सत्य का एक झोंका भी न सह सका। सचमुच वह बालू की ही जमीन पर खड़ा था। अब उनमें शिष्टाचार का अधिक व्यवहार होने लगा। एक-दूसरे की आवभगत ज्यादा करने लगे। वे मिलते-जुलते थे. मगर उसी तरह, जैसे तलवार से डाल मिलती है।
पंच परमेश्वर' प्रेमचंद की लिखी कहानी है। यह उनकी पहली कहानी है, जो 1916 में लिखी गयी थी।जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में मित्रता थी। उन दोनों के विचार मेल खाते थे। उनकी मित्रता लेन-देन में साझेदारी की थी। उन दोनों में परस्पर विश्वास था।
जुम्मन शेख हज करने गया। अपने घर की देखरेख उसने अलगू पर छोड़ रखी थी। अलगू चौधरो भी ऐसा ही करता था। बचपन से ही उन दोनों में मित्रता थी। जुम्मन के पिता जुमराती ही दोनों के शिक्षक थे।एक ऐसी घटना होती है कि दोनों की मित्रता टूटने लगी।
जुम्मन की बूढ़ी खाला ने पंचायत बुलायी। उसकी संपत्ति जुम्मन को मिलने के बावजूद उसकी सेवा ठीक से नहीं हो रही थी। जुम्मन की बीबी करीमन तीखा बोलती थी “जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के कुछ तेज-तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मन शेख भी निष्ठुर हो गए। अब बेचारी खाला जान को प्रायः नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं।"
दूसरी तरफ जुम्मन के अपने तर्क थे—“बुढ़िया न जाने कब तक जियेगी। दो-तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया, मानी मोल से लिया। बधारी दाल के बिना रोटियों नहीं उतरती। जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके, उतने से तो अब तक गाँव मोल ले लेते. अलगू पंच बनाए गए बूढो खाला ने कहा- 'बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?' अलगू उधेड़ बुन में फँस जाता है। हमारे साये हुए धर्म-ज्ञान की सारी संपत्ति लुट जाए, तो उसे खबर नहीं होती, परंतु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है।
फिर उससे कोई जीत नहीं सकता। अलगू बार-बार सोचता 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे।'
बुढी खाला पंचायत से कहती है. 'मुझे न पेट की रोटी मिलती है, न तन का कपड़ा। बेकस बेवा हूँ। कचहरी दरबार नहीं कर सकती। तुम्हारे सिवा और किसको अपना दुःख सुनाऊँ?
तुम लोग जो यह निकाल दो उसी पर चलूँ।" अलगू चौधरी पंच थे खाला को मिलकियत वापस करने का फैसला दिया। फैसले को सुनकर जुम्मन शेख सन्नाटे में आ जाता है। शीघ्र ही एक दूसरी घटना में जुम्मन शेख को एक मौका मिलता है अलगू चौधरी और समझ साहू के बीच पंच बनने का। बटेसर मेले से अलगू चौधरी ने बड़े मजबूत बैल खरीदें थे। एक बैल उसमें से मर जाता है। अब एक बैल को लेकर अलगू क्या करता ? उसने उसे समझू साहू के हाथ बेच देताहै।
साहू उससे बेगारी लेता था। खूब पिटाई भी करता था। चारा खान को भरपेट नहीं देता था। सड़क पर बैल गिर पड़ता है। वहीं रात काटनी पड़ती है। लेकिन किसी समय पलक झपक जाने पर किसी ने अंटी से रुपये ही नहीं गायब कर दिए, कई कनस्तर तेल भी नदारत सहुआइन इन सबके लिए अलगू चौधरी को कोसती है न निगोड़ा ऐसा कुलच्छनी बैल देता, ने जनम भर की कमाई लुटती ।" अब अलगू चौधरी के बैल का दाम साहू देने से इंकार कर देता है।
गाँव में पंचायत बैठती है। अलगू वादी है और जुम्मन पंच जुम्मन शेख के मन में जिम्मेवारी का भाव पैदा होता है। वह बदला लेने की भावना मिटा देता है । जुम्मन सोचता है में इस वक्त न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ मेरे मुँह से इस समय सदृश है और देववाणी में
अंत में जुम्मन ने फैसला सुनाया- 'अलगू और समझ साहू ! समझ साहू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दे ।।
सभी प्रसन्न हुए- 'पंच परमेश्वर को जय

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