हिन्दी का आधुनिकीकरण:-
हिन्दी साहित्य का छठा दशक आधुनिकता से विशिष्ट रूप से प्रभावित रहा है। इससे प्रतीत होता है कि यह 'आधुनिक' से कुछ पृथक् है। अत: आधुनिक और आधुनिक में अर्थ-भेद को समझना आवश्यक हो जाता है। पूर्व में 'आधुनिक' की शाब्दिक, समीक्षा हो चुकी है।
दूसरे फलक पर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के फलस्वरूप उत्पन्न मानवीय स्थितियों का नया, गैर रोमांटिक और अमिथकीय साक्षात्कार 'आधुनिकता' है। 'आधुनिकता' का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए जरूरी है कि उसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रवृत्ति को समझा जाये। आधुनिक काल अपने विज्ञान ज्ञान एवं प्रविधियों की वजह से मध्यकाल से पृथक् हुआ।
यह काल औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं बौद्धिकता से सम्बद्ध है; जिससे नवीन आशाएँ उभरीं और भविष्य का अभिनव स्वप्न देखा जाने लगा। इसके आलोक में देश, धर्म, राष्ट्र, ईश्वर आदि की नयी-नयी व्याख्याएँ की जाने लगीं। कालक्रम में इहलौकिक होकर यह आधुनिक दृष्टि प्रगतिशील बनी रही।
कालचक्र में प्रत्येक देश में पुनर्जागरण आया। इस चेतना से प्रेरित अनेक परतंत्र देश स्वतंत्र हुए एवं अपने सपने के आलोक में सरकारों का गठन हुआ। आजादी एवं आधुनिकता के पटल पर स्तंभित होकर मनुष्य ने पाया कि जिस औद्योगीकरण एवं प्रविधिकरण के सहारे उन्होंने सपनों को सच करने का सपना देखा था, वह कल्पना की हवा-उड़ान साबित हुई।
सरकारें सुस्थिर व्यवस्था के रूप में स्थापित हो गईं। लोकतंत्र एवं साम्यवादी सरकारें समान रूप से निराशाजनक साबित हुईं। व्यक्ति या तो व्यवस्था का पार्ट हो गया अथवा प्रविधि का। उसका अपना व्यक्तित्व एवं पहचान विलीन हो गयी।
इस खोये हुए व्यक्तित्व के संधान-प्रक्रिया का नाम 'आधुनिकता' है।
• आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ने मनुष्य का निरा बौद्धिक बना दिया था। नीशे के द्वारा 'ईश्वर मर गया' की घोषणा से बौद्धिक जीवन जगत् में एक क्रांतिकारी तब्दीली आई। वथार्थ का स्वरूप ही परिवर्तित हो गया। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, अच्छे-बुरे की परख की निकष धर्मशास्त्रों में निर्धारित की गई थी।
धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता जाती रही एवं पुरातन जीवन मूल्य विघटित हो गये। मनुष्य के द्वारा यह पाया गया कि वर्तमान परिस्थिति में वह असहाय, क्षुद्र और निरर्थक प्राणी है। विज्ञान के विकास ने भी निश्चयवादी सिद्धान्त को रिक्त प्रमाणित कर दिया।
इस संदर्भ में क्वांटम सिद्धान्त एवं सापेक्षतावाद से साबित हो गया है कि न तो कोई सार्वभौम सत्य होता है और न शाश्वत नैतिकता। अणुओं की सत्ता का अस्तित्व खारिज हो जाने के उपरान्त अणु शक्ति में परिवर्तित हो जाता है।
अंततः निश्चयात्मकता की समाप्ति की घोषणा हो गयी। अस्तित्ववादी दर्शन ने इस पर हामी भरकर इसे पुष्ट कर दिया। अस्तित्ववादी दर्शन ने पूर्ववर्ती दर्शन एवं विज्ञान की अमूर्तता पर प्रहार किया एवं अपने ठोस अनुभवों एवं प्रत्येक व्यक्ति के बुनियादी सवालों के साथ जुड़ा। जीवन-जगत् के ये बुनियादी सवाल हैं—व्यक्ति की व्यग्रता, दुःख, निराशा, अकेलापन, मृत्यु-बोध, स्वतंत्रता, त्रास आदि।
इसके साथ ही उसने सामूहिकताबाद एवं निश्वयवाद के विरुद्ध सिर उठाया। यह उन सभी विचारों के विपरीत है जो मनुष्य को अमनुष्य एवं अस्तित्वहीन बनाते हैं। उसके विचार में मनुष्य स्वतंत्र है-वह न वस्तु है, न मशीन है; वह क्रियात्मक शक्ति है।
मनुष्य स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में समर्थ है एवं इसके लिए खुद जिम्मेदार है। कीर्केगार्ड, सार्त्र आदि के अस्तित्ववादी दृष्टियों का आधुनिक पश्चिमी साहित्य पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।
सप्तम दशक के हिन्दी साहित्य में अ-कविता, अ-कहानी, अ-नाटक, अ-उपन्यास का जो उल्लेज हुआ उनके आधार पर लिखा गया कि साहित्य मात्र पारंपरिक रूपों को तोड़ने की कोशिश का मानकीकरण नहीं है बल्कि इन रूपों में आज के अनिश्चय, व्यर्थता, अकेलेपन, अजनबीपन, आत्म निर्वासन आदि को व्यक्त
किया गया है।
इस अभिव्यक्ति के स्तर की बात पृथक् है।
आधुनिकता का यह उल्लिखित बोध एक यथार्थ है जिसे स्वीकार करना समीचीन है। भारत में इस बोध को आमंत्रित करने की बहुत हद तक जिम्मेदारी भारत के भ्रष्टाचारी लोकतंत्र की भी है।
आठवें दशक के आरंभ में हिन्दी के साहित्यकारों में भी इससे मुक्ति के लिए बेचैनी प्रकट होने लगी। कामूं और सार्त्र ने भी पृथक्-पृथक् ढंग से व्यर्थता से मुक्ति की परिस्थितिजन्य बाधाओं में कर्म करने की चेतना जगाई है। सार्त्र का अस्तित्ववाद कर्म का ही दर्शन है।
अस्तित्ववादी ये विद्वान हमें सावधान तो कर सकते हैं परंतु अपनी दृष्टि नहीं दे सकते हैं। संघर्ष, बदलाव एवं अर्थान्वेषण के लिए खुद राह बनानी पड़ेगी। सार्त्र अस्तित्ववादी होने के साथ ही व्यक्तिवादी भी हैं। उसका अस्तित्ववाद फ्रांसीसी परम्परा से युक्त है।
अतएव मनुष्य के भावी जीवन, चिन्तन कला, साहित्य आदि का भविष्य दो बातों पर अवलम्बित प्रतीत हो रहा है। प्रथमतः अर्थहीनता की स्वीकृति पर एवं द्वितीय स्तर पर उसके भीतर से गुजरते हुए अपने संदर्भित अन्वेषण की प्रक्रिया पर।

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