यूनान में चिकित्साशास्त्र में 'कथार्सिस' शब्द रेचक औषधि द्वारा पेट की मलशुद्धि, रेचन वा मल निष्कासन के लिए प्रयोग किया जाता था। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात, पित्त, कफ ये तीन विकार होते हैं। ये विकार जब तक संतुलित अवस्था में रहते हैं तब तक शरीर स्वस्थ रहता है किन्तु यही विकार असंतुलित हो जाता है अर्थात् इसमें ह्रास या वृद्धि हो जाती है तो शरीर में रोग उत्पन्न हो जाता है।
रोग के उपशम के लिए शरीर के तीनों विकार को पुनः आनुपातिक स्थिति में ला देने से शरीर स्वस्थ हो जाता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए केवल औषधि ही पर्याप्त नहीं है, इसके लिए कुछ शारीरिक क्रियाएं भी हैं जिससे इन दोषों को दूर किया जा सकता है, जैसे—'कै'। अमाशय में संचित मल निष्कासन के लिए 'के' अर्थात् वमन कराया जाता है ।
पक्वाशय में संचित मल को इकालने के लिए दस्त (विरेचन) की सहायता ली जाती है और इसी प्रकार मूत्राशय की स्वच्छता के लिए 'वस्तिकर्म का प्रयोग किया जाता है। 'विरेचन' मूल रूप से मल निष्कासन द्वारा शरीर शोधने की प्रक्रिया है।
अरस्तू इसी रिचन के सन्दर्भ में इस सिद्धान्त का विचार-शुद्धि के लिए - प्रयुक्त करते हैं। स्वास्थ्य के लिए जिस प्रकार मल का निष्कासन-शोधन आवश्यक है, उसी प्रकार मानसिक मल का निष्कासन शोधन भी आवश्यक है। मानसिक मल जैसे ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, क्रूरता आदि भी मनुष्य को अस्वस्थ बना देते हैं। इसीलिए इनका भी संतुलित रूप में होना जरूरी है।
अरस्तू को धारणा यह थी कि वासनाएँ मानव का सहजात गुण है। मनोविज्ञान भी इसको स्वीकार करता है। अरस्तु इसे मानव जीवन का स्थायों एवं अनिवार्य अंग मानते हैं। भय, करुणा आदि हीन वर्ग की भावनाएँ भी मानव हृदय में उसी प्रकार विद्यमान रहती हैं!
जैसे साहस, शौर्य, वीरता, प्रणय आदि उच्च भोवनाएँ विद्यमान रहती हैं। अरस्तु का कहना है कि इन भावनाओं के दमन से समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि उपयुक्त अवसर प्राप्त होते ही ये भावनाएँ जागृत होकर भड़क उठेंगी, उस समय मानव उन भावनाओं के अधीन विवश हो जायेगा।
अतः इस समस्या का समाधान के इन वासनाओं को उसी प्रकार उदबुद्ध करने, विरेचित होने और मम शान्ति के रूप में व्याख्यायित करते है, जैसे वैध द्वारा उदर विकार पीड़ित व्यक्ति को रेचक औषधि देकर पहले उदरस्थ मल को उदबुद्ध किया
साहित्य सिद्धान्त एवं हिन्दी आलो
जाता है और उसके बाद मलविरेचन द्वारा उसे शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से शान्त सन्तुष्ट एवं स्वस्थ बनाने में सफलता प्राप्त की जाती है। अरस्तू स्वयं एक वैद्य थे अतः इस प्रक्रिया का अनुभव उन्हें स्वभावतः हो पुत्र गया था। इस प्रकार माना जा सकता है कि उन्होंने 'विरेचन' शब्द चिकित्साशास्त्र से ही लिया होगा।
"विरेचन शब्द को अरस्तू ने राजनीतिक और काव्यशास्त्र के सम्बन्ध में विवेचन किया है। उन्होने विरेचन की कहीं व्याख्या नहीं की है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम प्लेटी ने ही किया था पर इसके अर्थ को व्याप्ति देने का श्रेय अरस्तु को हैं। अरस्तू ने चूँकि विरेचन को कहीं परिभाषित नहीं किया है, इसलिए इसके अर्थ को लेकर विद्वानों ने अलग-अलग मत दिए हैं।
परवर्ती व्याख्याकारों ने लक्षणा के आधार पर विरेचन के तीन अर्थ किए :-
विरेचन के अर्थ :-
(1) धर्मपरक अर्थ
(2)नीतिपरक अर्थ तथा
(3) कलापरक अर्थ
(1) धर्मपरक अर्थ :- इस अर्थ की एक विशेष पृष्ठभूमि है। प्रो. गिलबर्ट तथा कुछ अन्य विद्वानों ने विरेचन की धर्मपरक व्याख्या ही प्रस्तुत की है। इन विद्वानों के अनुसार यूनान में भी अन्य देशों की तरह नाटक का प्रदर्शन धार्मिक तथा विशेष पर्वो पर होता था, कलात्मक उद्देश्य से इसका प्रयोग नहीं होता था।
कहते हैं यूनान में नाटक का प्रारम्भ धार्मिक उत्सवों से हुआ। प्रो. गिलबर्ट मरे के अनुसार यूनान में दिओन्यूमस से सम्बद्ध उत्सव एक प्रकार का शुद्धि उत्सव था। विगत वर्ष के पाप, कलुष, मृत्यु आदि से शुद्धि का प्रतीक था।
ऐसा भी कहा जाता है कि 367 ई. पूर्व में यूनानी शासदी का प्रवेश रोम में किसी महामारी निवारण के लिए हुआ था। अरस्तू ने स्वयं लिखा है कि हाल की स्थिति से उत्पन्न आवेश के शमन के लिए यूनान में उद्दाम संगीत का प्रयोग किया जाता था।
डॉ. कांतिचंद्र पाण्डेय ने 'कथार्सिस' के धार्मिक प्रयोग के कई उदाहरण अपनी रचना 'कम्पेरेटिव इंस्थेटिक्स' (खण्ड-2) में दिए हैं। यथा- "किसी मृतक के घर जो बाहर के लोग आते थे, वे मृतक के स्पर्श से अपने को
अपवित्र मानकर द्वार पर रखे जलपात्र से, जो दूसरे के घर से लाया जाता था, अपने को पवित्र करने के बाद वापस जाते थे।
भारत में भी यह संस्कार प्रसिद्ध है, बस इसका रूप कुछ अलग है। यहाँ के लोग शव का दाह संस्कार होने के बाद अरथी के साथ जाने वाले लोग स्नान करते हैं।"
अरस्तू ने एक अन्य प्रकार के धार्मिक कथासिस का उल्लेख अपने राजनीतिशास्त्र में किया है। कभी कोई किसी देवता द्वारा आविष्ट (possessed) हो जाता था। (भारत के गाँधों में भी खासकर दशहरे के अवसर पर, देवता 'को 'खेलते-खेलते कोई आविष्ट हो जाता है, वह सहा और क्षम्य माना जाता है।
उस समय गाजे-बाजे खूब जोर से बजते हैं जो उसके आवेश को बढ़ा देते हैं और फिर उन्हीं से आवेश धीरे-धीरे शांत भी हो जाता हैं।) यूनान में कुछ लोगों पर धार्मिक उन्माद चढ़ता था जिसे उन संगीत द्वारा शांत किया जाता था। यहाँ पर अरस्तू ने संगीत के विरेचक प्रभाव की बात कही है।
वे संगीत के तीन प्रभावों की चर्चा करते है :-
(1) पहला प्रकार का संगीत वह है जो नैतिक प्रभाव या शैक्षिक मूल्य उत्पन्न करता है।...
(2) दूसरे प्रकार का संगीत वह है जिसका उपयोग आनन्द के लिए किया जाता है। तथा
(3) तीसरे कर का संगीत अति होता है तथा यह धार्मिक उन्माद को शांत करने के काम में आता है।
इस तीन प्रचार के संगीतों में तीसरे के संगीत को अरस्तू ने
विरेचक कहा है। इस प्रकार का संगीत एक प्रकार की शारीरिक उत्तेजना है जो धार्मिक हमाद के निस्सरण का मार्ग है। इसके फलस्वरूप "अवशिष्ट व्यक्ति प्राकृतिक विश्राम की स्थिति में आ जाते हैं, जैसे उसकी विरेचनात्मक चिकित्सा हुई हो।
इस संगीत का भावात्मक परिणाम निर्दय आनन्द है। इस प्रकार बाह्य उत्तेजना और उसके शमन द्वारा आत्मिक शुद्धि विरेचन का उद्देश्य होता था।
(2) नीतिपरक अर्थ :- विरेचन के नीतिपरक अर्थ की व्याख्या प्रसिद्ध जर्मन विद्वान वारनेज ने की है। उनको मान्ता है कि मानव मन मनोविकारों का कोष है। ये मनोविकार चित्र में वासना रूप में स्थित रहते हैं। इनमें
कुछ मुखद, कुछ दुखद और कुछ सुख-दुःखात्मक होते हैं। करुणा और त्रास मानव मन के दुःखद मनोविकार है।
त्रासदी रंगमंच पर ऐसे दृश्य प्रस्तुत अतिरंजित रूप दिए जाते हैं। त्रासदी में ऐसी घटनाओं का प्रदर्शन होता है जो त्रास और करुणा से ओत-प्रोत होती है। नाटक का प्रेक्षक जब त्रास से ओत-प्रोत इन दृश्यों को देखता है तो उसके मन में ये भाव बड़े तीव्र रूप से उद्वेलित होते हैं और कुछ समय उपरान्त इनका वेग उपशमित हो जाता है।
दर्शक त्रासदी को देखकर मानसिक शान्ति का अनुभव करता है क्योंकि उसके मन से वासना रूप में स्थित करूषा तथा आस के मनोवेगों के देश समाप्त ते । अतः विरेचन का नीतिपरक अर्थ हुआ- मनोविकारों की उत्तेजना के बाद उद्वेग का शमन और मानसिक शान्ति का अनुभव
19वीं शताब्दी के कई विचारकों ने यह भी स्थापित किया है कि भय करुणा के भावों के त्रासदी में प्रदर्शन द्वारा दर्शको के मन में रहने वाले इन्हीं भावों और अन्य भावों को भी निजी स्वार्थ की सीमा से उठाकर विचिन से उदान कर दिया जाता है जिससे व्यक्ति की नैतिकता उदत्त हो जाती है।
सैमुएल जॉनसन की जीवनी लिखने वाले बोरवेल ने लाइफ ऑफ • जॉनसन में लिखा है कि जब से उनसे पूछा कि नय, आतंक और करुणा के दृश्यों से हमारी भावनाओं का विरेचन या परिष्कार किस प्रकार होता है, तो उन्होंने बताया कि ग्रासनाएँ, मनुष्य के कार्यों की महान प्रेरक होती. हैं, पर वे बड़ी मैली और विकारग्रस्त होती है। अतः यह आवश्यकता है।
कि उनका विरेचन और परिष्कार भय और करुणा के प्रदर्शन से किया जाय। उदाहरण के लिए मंच पर कोई अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति, जिसने अन्याय से अपने को उच्च पद पर पहुँचाया हो, दण्डित होता दिखाया जाता है तो हमें उस महत्त्वाकांक्षा के दुष्परिणाम से भय लगने लगता है। इस प्रकार भावों का परिष्कार होता है।
• इसी प्रकार आलोचक रेपित का मत है कि अभिमान, निष्ठुरता मानव जाति के दुर्गुण है। प्रासदी में जब दो अन्य भावों, भय और करुणा को दिखाया जाता है और हम देखते हैं कि पुण्यकर्मी सज्जनों और महान व्यक्तियों को भी दुर्भाग्य का शिकार होना पड़ता है तो हमारे हृदय में उनके प्रति दया की भावना जागृत हो जाती है जो हमें उनकी सहायता करने को प्रेरित करती है। हमारे हृदय में सभी संकटग्रस्त लोगों के प्रति संवेदनशीलता

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