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हिन्दी-उर्दू के संबंधों पर प्रकाश डालें।


हिन्दी उर्दू सम्बन्ध. :-----


यद्यपि हिन्दी और उर्दू भाषा की प्रकृति, उत्पत्ति एवं व्युत्पत्ति में काफी अन्तर है तथापि दोनों भाषाओं के मध्य अन्तरंग सम्बन्ध स्थापित है। हिन्दी की उत्पत्ति संस्कृत से मानी जाती है एवं उर्दू की उत्पत्ति अरबी से हुई है। उर्दू को युद्ध की भाषा कहा जाता है अर्थात् युद्ध के समय संकेत के लिए खींची गई रेखाओं को तरतीव प्रदान कर भाषिक स्तर प्रदान किया गया है। 

भले उर्दू-अरबी से निकली हो, अरबी देशों से उसका प्रभाव विश्व के अन्य देशों में हुआ हो, मगर हिन्दी और उर्दू के वाक्य विन्यास एक जैसे हैं। अनुभूति के स्तर पर भी इन दोनों में समता है। 


हिन्दी के आधुनिक विकास के प्रथम चरण में हिन्दी को दो भागों में बाँटा गया था. :-----


1. पंडिताऊ हिन्दी

2. मौलवी स्टाइल की हिन्दी।




पंडिताऊ हिन्दी से अभिप्राय संस्कृत से प्रभावित अर्थात् तत्सम प्रधान हिन्दी से है एवं मौलवी स्टाइल की हिन्दी से तात्पर्य अरबी, फारसी, उर्दू प्रभावित हिन्दी से है। इस हिन्दी में उर्दूपन परिलक्षित होता है। 

इसीलिए तो अयोध्या प्रसाद खत्री ने हिन्दी और उर्दू में मात्र उरूफ का अन्तर माना है वरना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों के बीच अटूट सम्बन्ध है।








                    वैश्वीकरण और हिन्दी



वैश्वीकरण अंग्रेजी Globalisation का हिन्दी रूपान्तर है। वैश्वीकरण के हिन्दी पर्याय के रूप में भूमंडलीकरण शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। फिलहाल वैश्वीकरण का विमर्श बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से विश्व क्षितिज पर होने लगा है। मगर इस भावना की प्रथम प्रेरणा पुंज संस्कृत साहित्य में है। 

भारतीय संस्कृति के उद्गाताओं के द्वारा काफी समय पूर्व ही अपनी उदारता को प्रतिभाषित करने के लिए 'वसुधैव कुटुम्बकम्' वाक्य का प्रयोग किया था। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात् वसुधा पर निवास करने वाले समस्त प्राणी हमारे कुटुम्ब हैं। इन्हीं भावों का पल्लवन इस दोहे

साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय । 

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय। 



में होता है। अर्थात् हे प्रभो! मुझे इतना दीजिए जिसमें सारे कुटुम्ब समाहित हो जायें। कवि खुद भी भूखा न रहने की याचना करने के साथ-साथ साधु की भी तृप्ति की बात की गई है।


 इन सारे विमर्शो में भारतीय संस्कृति की उदारता अर्थात् वैश्विक चिन्तन से आई मनःस्थिति का मानचित्र उभरा प्रतीत होता है। सच है दुनिया के लोगों को 20वीं शताब्दी में वैश्विक चिन्तन का अवकाश प्राप्त हुआ मगर भारतीय संस्कृति में आर्ष काल से यह चिन्तन 
परिव्याप्त है।








इसी वैश्विक चिन्तन एवं आचरण के फलस्वरूप इसने सर्वप्रथम एवं संभ जागकर दुनिया को जगाने का संकल्प ले लिया। इस रूप में उसने दुनिया को अपने आदर्श से परिचित कराया फलतः भारत दुनिया के गुरु रूप में अभिहित होने लगा। आज भी विश्व के दर्जनाधिक देश भारत को अपना गुरु मानकर आस्था निवेदित करता है।


 इस वैश्वीकरण अर्थात् 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का चिन्तन-पक्ष सांस्कृतिक है। इसके उपरान्त भौतिक, व्यापारिक एवं ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में वैश्वीकरण का उद्घोष हो चुका है। कम्प्यूटर के आविष्कार एवं इसके अन्तर्गत इंटरनेट के संचालन से वैश्वीकरण को काफी बल मिला है।

 कम्प्यूटर के इंटरनेट के सहारे एक से दूसरे देशों तक हमारी भावना, हमारे विचार, हमारा ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ वणिक व्यापारों का आदान-प्रदान संभव हो सका है। इससे व्यापारियों का आकलन एवं बाजार क्षेत्र मात्र देश की सीमा तक ही नहीं वरन् आर-पार के अनेक देशों तक होने लगा। है।


वैश्वीकरण की इस गतिविधि का प्रभाव हिन्दी के प्रचार प्रसार पर भी व्यापक रूप से पड़ा है। इंटरनेट से जुड़ जाने से हिन्दी पत्रकारिता को तो मानो पंख ही लग गया है। आज के हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, उदित वाणी, अमर उजाला, पंजाब केसरी, राजस्थान

 पत्रिका, नवभारत टाइम्स, प्रातः कमल, आबाज आदि अखबारों का ताजा संस्करण आज ही इंटरनेट के माध्यम से अमरीका, रूस, सूरीनाम, मॉरीशस, फ्रांस, इटली, जापान, ईरान, ईराक, इंग्लैण्ड आदि देशों में भी पढ़ा जाता है। 


दूसरी ओर इन देशों में भी यदि हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं तो उसे भी भारत के कोने-कोने में पढ़ा जा रहा है। इसी प्रकार अनुसंधान, पुस्तक प्रकाशन, शैक्षिक संस्थानों की जानकारियाँ विदेशों के विविध देशों में होती रहती हैं।


वैश्वीकरण के चिन्तन एवं गतिविधियों से हिन्दी के पाठक वर्ग में काफी वृद्धि हुई है। तब देवकीनन्दन खत्री कृत 'चंद्रकांता' एवं 'चंद्रकांता संतति' के प्रकाशन से उसकी तिलस्मिता से प्रभावित होकर दुनिया के हिन्दियेतर भाषा-भाषी हिन्दी सीखने को विवश हुए


थे। आज इंटरनेट के द्वारा विदेशी नागरिक हिन्दी सीखने का अरमान पूर्ण करते हैं। 


वैश्वीकरण के परिवेश में जिस प्रकार भारतीय जिज्ञासु नागरिक विदेशी भाषा सीखकर अपने ज्ञान का विस्तार करते हैं उसी प्रकार विदेशी नागरिक भी हिन्दी के विपुल साहित्य, विपुल शब्द-भंडार एवं ज्ञान-आध्यात्म से परिचित होना चाह रहे हैं। आज इंटरनेट के माध्यम से हिन्दी पाठ भी पढ़ाया जाता है। इस रूप में आज हिन्दी विश्वं-फलक पर स्थापित हो गई है। 

विश्व की सैकड़ों भाषाओं में हिन्दी को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया है। अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने में विज्ञान, ज्ञान, ज्योतिष, भूगोल, इतिहास, दर्शन, प्राद्योगिकी एवं तकनीकी शब्दावली के हिन्दी रूपान्तरण का काफी महत्वपूर्ण योगदान है। इस दिशा में भारतीय राष्ट्रपति का आदेश 1960 में कहा गया है कि शब्दावली के निर्माण में उसकी स्पष्टता, यथार्थता एवं सरलता का होना आवश्यक है।

 अन्तर्राष्ट्रीय शब्दावली को ग्रहण किया जाय अथवा जहाँ आवश्यक हो उसे हिन्दी के अनुकूल कर लिया जाये। भारतीय भाषाओं के लिए शब्दावली निर्माण के समय उसमें एकरूपता को अनिवार्य माना गया है। वैश्वीकरण के आलोक में हिन्दी को स्थापित करने के लिए दो प्रमुख कारक हैं.  :--------


1. पारिभाषिक शब्दावली, एवं

2. अनुवाद।








                   पारिभाषिक शब्दावली


वैश्वीकरण में हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने की दिशा में इसकी पारिभाषिक शब्दावली का अहम् योगदान है। ये हिन्दी विकास के महत्वपूर्ण तत्व हैं। प्रयोजनमूलक हिन्दी के विकास में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के उद्भव एवं विकास के साथ-साथ उसकी सटीक • अभिव्यक्ति की आवश्यकता महसूस की गई। फलतः हिन्दी में प्रशासन, विधि, विज्ञान, दर्शन, भूगोल, भूगर्भ, अंतरिक्ष से 

सम्बन्धित पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण एवं प्रचलन प्रारंभ बं हुआ। इससे देश से विदेशों तक हिन्दी की पहचान स्थापित हुई एवं उसके लेखन, पठन एवं वाचन को अत्यधिक गति प्राप्त हुई है। 

इस प्रकार हिन्दी के व्यापक प्रचार एवं प्रसार में पारिभाषिक शब्दावली का योगदान अविस्मरणीय है। इसके साथ ही विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में इसके प्रयोग से पारिभाषिक शब्दावली की महत्ता अक्षुण्ण है।






                            अनुवाद

वैश्वीकरण के दौर में अनुवाद मनुष्य की सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकता बन गया है।
यह देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में निवास कर रहे मनुष्य के जीवन-जगत् के बहुविध धरातल पर एक-दूसरे से निरन्तर संपर्क बनाकर वैयक्तिक एवं सामाजिक सम्बन्धों की कड़ी को दृढ़तापूर्वक जोड़ता है। 

अतः हिन्दी भाषाई एवं साहित्य के स्तर पर भावान्तरण में भाषान्तर अर्थात् अनुवाद अहम् आवश्यकता के रूप में प्रकट होताहै। अनुवाद के सहारे विदेशी भाषाओं के ज्ञान-विज्ञान एवं भावों को हिन्दी में जाना जाता है। इससे हिन्दी के ज्ञान-भंडार एवं शब्द भण्डार में अपरिमित वृद्धि होती है। अनुवाद का ध्येय कूप से निकलकर विशाल वैज्ञानिक एवं ज्ञान सागर में प्रवेश करना है।


 वैश्विक क्षितिज पर अवस्थित संस्कृतियों एवं सभ्यताओं से संपर्क की आकांक्षा रखने वाले दो भिन्न-भिन्न भाषा भाषी व्यक्तियों अथवा समुदायों के संपर्क एवं संप्रेषण में अनुवाद मध्यस्थता का महत्वपूर्ण कार्य करता है। अतः वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी के विपुल प्रचार-प्रसार में अनुवाद की महत्ता अक्षुण्ण है। हिन्दी के बिना वैश्वीकरण को संपूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती है।

इस प्रकार अपभ्रंश से निकली हिन्दी अनेक आरोह-अवरोहों से गुजरकर वैश्वीकरण के दौर में अपना परचम लहरा रही है। भारतीय स्वतंत्रता के उपरान्त वह भारत संघ की राजभाषा के रूप में अभिहित होकर समस्त भारतीयों के बीच तो लोकप्रिय हो ही चुकी है। इसके साथ ही वह अमरीका, इंग्लैण्ड, मौरीशस, सूरीनाम, त्रिनिनाद, फिजी, रूस जैसे देशों के पाठकों को भी अपनी ओर आकर्षित कर  चुकी है। इस रूप में

 कहा जा सकता है कि हिन्दी मात्र भारत की राजभाषा ही नहीं बल्कि दुनिया की संपर्क भाषाओं की पंक्ति में आगे है एवं हिन्दी का शब्द सामर्थ्य, साहित्य सामर्थ्य एवं पारिभाषिक शब्दावली सामर्थ्य इतना समृद्ध है कि वैश्वीकरण की यात्रा हिन्दी के बिना पूरी नहीं हो सकती है।  अतः हिन्दी अब मात्र हिन्दुस्तानियों की भाषा नहीं वरन् ईसाइयों, पारसियों, मंगोलियों, मुसलमानों, रूसियों, चीनियों की भी भाषा बन चुकी है। इसके वाक्य विन्यास दूसरी भाषाओं के शब्दों को भी इस रूप में ग्रहण कर उसे अपने में इस प्रकार रचा-बसा लेती है,!


 जिससे उसकी मौलिक पहचान समाप्त होकर उसकी प्रकृति हिन्दी के कदम से कदम मिलाकर हिन्दी की सहयात्री बन जाती है। आज हिन्दी अपनी इन विशेषताओं के कारण विश्व की विविध भाषाओं में महत्वपूर्ण स्थान बना चुकी है। यदि हिन्दी की यही चारुता एवं हिन्दी भाषा-भाषियों की जिज्ञासा बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी विश्व की संपर्क भाषा के रूप में अभिहित हो सकेगी।

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