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हुमायूँ का चरित्रांकन कीजिए। अथवा, हुमायूँ जीवन भर ठोकर खाता रहा और ठोकर खाकर ही मरा। इस कथन की पुष्टि कीजिए।


Ans बाबर की मृत्यु के उपरान्त बाबर का ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँ 30 सितम्बर 1530 ई० को बाबर के उत्तराधिकारी के रूप में सिंहासनारूढ़ हुआ। सिंहासनारोहण के पश्चात् हुमायूँ के सम्मुख सम्बन्धियों के विद्रोह तथा अफगानों की समस्यायें विकट रूप धारण किये हुए थी। हुमायूँ सन् 1530 ई० से 1540 ई० तक इन समस्याओं से जूझता रहा, परन्तु अन्त में असफल होकर निराश अवस्था में उसे भारत से पलायन करना पड़ा। इसलिए विद्वानों ने कहा है कि सिंहासन, हुमायूँ के लिये "कोटों की शैय्या थी। न कि फूलों की सेजा"

हुमायूँ की कठिनाइयों के सम्बन्ध में कर्णल मैलिसन (Col Malison) ने लिखा है कि बाबर ने अपने उत्तराधिकारी हुमायूँ को केवल विजय का विचार ही उत्तराधिकारी में प्रदान किया था। हुमायूँ ने केवल इस विचार को प्राप्त किया और उसका अन्य विधियों के साथ संयोग नहीं किया जिसके कारण उसके पति ने जो कुछ विजय किया था, उसे उनसे खो दिया। बाबर से प्राप्त अपने विकट समस्यायें उसके सम्मुख मुँह 
फाड़े खड़ी थीं। 

उनमें से निम्नलिखित समस्यायें प्रमुख थीं:-- 


1. उत्तराधिकार के नियम का अभाव उत्तराधिकार के निश्चित नियम के अभाव   :-- के कारण भी हुमायूँ को कठिनाई का सामना करना पड़ा था, क्योंकि बाबर के सभी पुत्र अपने आपको सम्राट घोषित करने लगे। ऐसी स्थिति में हुमायूँ के लिए शासन का कार्य कुशलतापूर्वक करना। पूर्णतया असम्भव था। Dr. Erskin के अनुसार तलवार ही वास्तविक उत्तराधिकारी का चुनाव के लिए प्रमुख निर्णायक थी और प्रत्येक पुत्र अन्य भाग्य की अपने भाईयों के विरूद्ध परीक्षा करने के लिए तैयार हो गया।


2. असंगठित साम्राज्य :--  हुमायूँ को बाबर से एक असंगठित साम्राज्य प्राप्त हुआ था, जिसमें चारों ओर अराजकता फैली हुई थी। राशबुक विलियम्स (Rushbrook Williams) के अनुसार बाबर ने अपने पुत्र को एक ऐसा साम्राज्य विरासत में दिया था, जिसे केवल युद्धकालीन परिस्थितियों में ही स्थिर रखा जा सकता था। वे परिस्थितियाँ उस समय के शांतिपूर्ण वातावरण में दुर्बल आकृतिविहीन और 
आधार रहित बन गई।



3. संधियों के विद्रोह दमन :-- साम्राज्य की अराजकत स्थिति के अवसर का फायदा उठाकर लगभग हुमायूँ के सभी सम्बन्धियों ने विद्रोह कर दिये थे, सर्वप्रथम बाबर की बहन के पति सैयद  मेंहदी ख्वाजा ने विद्रोह किया
था। इस विद्रोह को हुमायूँ ने अपने प्रधानमन्त्री मोहम्मद खलीफा की सहायता से दबाया था। दूसरे विद्रोही मोहम्मद जमा मिर्जा को हुमायूँ ने कैद किया और बयाना के किले में भेज दिया, परन्तु वह भाग गया और वहादुर शाह से जा मिला। हुमायूँ ने अपने तीसरे शत्रु को अन्धा करवा दिया तथा सभी सम्बन्धियों पर विजय प्राप्त की।




4. अफगानों की समस्या-  बाबर ने पानीपत युद्ध में अफगानों को समूल नष्ट नहीं किया था। इसलिए बाबर की भूल हुमायूँ के लिए एक भयानक समस्या बन गई। हुमायूँ के समय अफगानों के प्रमुख सरदार महमूद लोदी, अलाउद्दीन लोदी तथा शेर खां थे। पानीपत के युद्ध के सम्बन्ध में लेनपूल ने लिखा है कि अफगान सर्प केवल घायल हो गया था, मरा न था। 


5. हिन्दू व मुस्लिम दोनों में असंतोष- बाबर की नीतियों ने हिन्दू व मुसलमान दोनों में असंतोष की भवना उत्पन्न कर दी थी। इसलिए जब हुमायूँ सिंहासनारूढ़ हुआ तब यह समस्या अपने भयानक रूप में उनके समक्ष उपस्थित हुई, क्योंकि हिन्दुओं की तो बात क्या मुस्लिम भी उसके समर्थक नहीं बन सके।



6. रिक्त राजकोष :-- बाबर ने भारतीय साम्राज्य स्थापना में जितने भी युद्ध लड़े थे, उनमें अत्यधिक धन व्यय हुआ था। इसलिए सिंहासनारोहण के समय राजकोष पूर्णतः खाली हो गया था और जो कुछ बचा था, वह हुमायूँ ने अपनी कालिंजर विजय के पश्चात् दावत में समाप्त कर दिया था। अतः समस्याओं को सुलझाने के लिए उसके पास कुछ भी धन नहीं था।

7. जातीय एकता का अभाव:-  यूँ तो बाबर की सेना में हर जाति के सैनिक थे परन्तु उनमें जातीय एकता का पूर्णतया अभाव था। अतः सेना में हुमायूँ के प्रति अपनत्व की भावना नहीं थी और यह अपनत्व का अभाव ही हुमायूँ के लिए समस्या बन गया।



8. बाबर का आदेश :- बाबर के मृत्यु शैय्या पर दिया गया अन्तिम आदेश भी हुमायूँ के लिए एक समस्या बन गया क्योंकि हुमायूँ को अपने अन्तिम आदेश देते हुए कहा था कि मेरी अन्तिम इच्छा का सार यही है कि
 अपने भाइयों के विरूद्ध कभी कोई कार्य न करना चाहे वेउसके योग्य ही क्यों न हो। हुमायूँ पर बाबर के इन शब्दों का मार्मिक प्रभाव पड़ा परन्तु साथ ही साथ इन शब्दों ने बाबर के अन्य पुत्रों को उच्छृंखल बना दिया। वह रात दिन हुमायूँ के लिए समस्या उत्पन्न करने को ही सोचते रहते थे। हुमायूँ के सम्बन्ध में फरीश्ता (Farista) ने लिखा है है कि हुमायूँ की आकृति सुन्दर थी और उसका वर्ण काँसे जैसा था। 

उसमें कोमलता, उदारता, निर्भीकता, दानशीलता आदि गुण अधिक मात्रा में विद्यमान थे। हुमायूँ के चचेरा भाई मिर्जा हैदर के शब्दों में उसमें अनेक श्रेष्ठ गुण थे और वह युद्धों में पराक्रमी, दावतों में प्रसन्नचित तथा बहुत ही उदार था। निजामुद्दीन अहमद की दृष्टि से हुमायूँ का चरित्र देवदूतों जैसा चरित्र था और वह पुरुषोचित गुणों से विभूषित था। एवं साहस तथा शूरतत्व में अपने युग के सभी राजाओं से बढ़ा चढ़ा था।

हुमायूँ के चरित्र में अनेक अवगुण भी थे, जिनके कारण वह हमेशा असफल हुआ। ईश्वरी प्रसाद ने यहाँ तक कहा कि यदि असफलता की किचित मात्र सम्भावना भी कही होती थी तो हुमायूँ उससे बच नहीं सकता था। वह सब गिरता पड़ता रहा और गिर कर ही उनकी मृत्यु हुई। उसके चरित्र में निम्नलिखित अवगुण थे, जिसके कारण उसने अपनी विरासत में प्राप्त कठिनाइयों को और अधिक जटिल बना लिया था। 


(1) अयोग्य व स्थाई सिद्धांतों का अभाव:-

हुमायूँ अयोग्य एवं सिद्धांतहीन था। मैलिसन
महोदय के अनुसार हुमायूँ वीर, प्रसन्नचित, हास्यप्रिय, उदार और दयालु, होने के कारण स्थायी सिद्धान्तों पर एक राजवंश की स्थापना करने के लिए अपने पिता से भी योग्य था। 

(2) अतिशय उदार :-      हुमायूँ के समय ऐसी परिस्थितियाँ थी कि उसकी उदारता का गुण भी अवगुण बन गया था। उसने अपनी उदारता के कारण ही अपना साम्राज्य अपने भाईयों में बाँट दिया था और अन्त में स्वयं ही आश्रय पाने के लिए भटकता फिरा। वह अपने शत्रुओं को बार-बार क्षमा कर देता था। इसलिए भी उसकी कठिनाइयाँ बढ़ गई थीं।

 (3) अस्थिर विचार वाला व्यक्ति:-  मैलिसन के अनुसार वह चंचली विचारहीन तथा अस्थिर था। उसमें कर्तव्य की ओर झुकने की कोई भी बलवती भावना नहीं थी। वह किसी भी उदारता, अपव्ययता में तमन्ना अनुराग दुर्बलता में परिवर्तित हो जाता था। वह किसी भी एक दिशा में अपने विचारों को कुछ समय के लिए पूर्ण रूप से स्थिर नहीं रख सकता था। 


(4) ऐयास प्रवृत्ति वाला :- हुमायूँ ऐयास प्रवृत्ति का व्यक्ति था। भारत से पलायन करते समय भी उसने हमीदा बानू बेगम से प्रेम किया और अपने मुछ अमूल्य दिन यूँ ही गवाँ दिए। प्रसिद्ध इतिहासकार Lanepool के अनुसार उसमें चरित्र और दृढ़ निश्चय का भारी अभाव था। वह स्थिर प्रयासों को करने में असमर्थ था। प्रायः विजय की लहर उसे जनानखाने के आनन्दों में लीन कर देती थी तथा वह अपने अमूल्य क्षणों को अफीम की पिनक में नष्ट कर डालना था।

(5) अयोग्य वे नेतृत्वहीन सेनापति :-  इस सम्बन्ध में डॉ० ईश्वरी प्रसाद (Dr. Ishwari parsad) समान महान सेनापति और शेरशाह के समान बुद्ध विधियों का कुशल ज्ञाता न था। उसको सैनिक योजनाएँ दोषपूर्ण होती थी और कभी ठीक प्रकार पूरी नहीं उतरती थी।

(6) दूरदर्शिता का अभाव:-  हुमायूँ किसी भी कार्य को करने से पहले उस पर विचार विमर्श नहीं करता था इसलिए उसके शत्रु अवसर पाकर बार-बार विद्रोह करते रहते थे। 

(7) कूटनीतिकता का अभाव :- हुमायूँ में कूटनीतिक योग्यता का भी अभाव था। इसलिए • शेरशाह के समक्ष उसे मुँह की खानी पड़ी।



(8) चाटुकारिता का दोष :- हुमायूँ अपने विद्रोहियों की चाटुकारिता का शीघ्र ही शिकार हो जाता था। शेर खाँ ने स्वयं कई बार उसे अपने भाई के जाल में फंसाया तथा हिन्दूबेग व बहादुर शाह ने भी कई बार उसको आंखों में धूल झोंकी थी।

 (9) धार्मिक कट्टरता का अभाव:-  हुमायूँ के अनेक समर्थकों ने उसका साथ इसलिए छोड़ दिया था कि उसमें धर्म के प्रति कट्टरता की कमी थी। वह स्वयं सुन्नी मुसलमान था फिर भी उसने सहायता की आशा के लिए फारस के शाह के शिया धर्म को ग्रहण कर लिया था तथा अपनी काम भावना की पूर्ति के लिये शिया महिला से प्यार किया था। अन्त में कहा जा सकता है कि अपने दुर्बल चरित्र एवं अपनी भूलों के कारण हुमायूँ सदा सफलता की सीढ़ियों से लुढ़कता रहा और अन्त में

 उसका निधन भी सीढ़ियों से लुढ़क कर हो हुआ डॉ० ईश्वरी प्रसाद (Dr. Ishwari Prasad) के अनुसार उसके जीवन के उसके चरित्र की सबसे प्रमुख कमी अध्यवसाय अर्थात् निरन्तर उद्योग करते रहने की प्रवृत्ति थी और उसके जीवन में आदि से अन्त तक वह एक ईश्वरी वरदान के रूप में स्थिर रही। इसके अभाव में उसके फिर से भारत के साम्राज्य को विजय करना असम्भव ही था।

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