बाबर के जीवन और उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
अथवा,
बाबर की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
Ans:--- बाबर का पिता उमर मिर्जा फरगना के एक छोटे से राज्य का स्वामी था जो उसे अपने पूर्वजों से मिला था। जब बाबर की अवस्था वल ग्यारह वर्ष की थी तब उसके पिता का परलोकवास हो गया। इस छोटी-सी अवस्था में बाबर अपने पिता के राज्य का स्वामी बन गया। स्वयं बाबर ने लिखा है कि, “हिज्र सन् 899 के रमजान के महीने में अपनी आयु के बारहवें वर्ष में फरगना राज्य का शासक बना था। प्रारम्भ में उसके सम्बंधियों ने उसे कष्ट पहुँचाने का प्रयत्न किया, किन्तु उसने उनका सफलतापूर्वक सामना किया। बाबर बड़ा ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। अपने पिता के छोटे से राज्य से वह संतुष्ट न रहा और वह अपने पूर्वज तैमूर के साम्राज्य का स्वामी बनने का स्वप्न देखने लगा। सबसे पहले उसकी नजर तैमूर की राजधानी समरकन्द पर पड़ी और उसे जीतने का निश्चय कर लिया। यद्यपि समरकन्द को जीतने में वह दो बार सफल रहा, परन्तु अन्त में उसे फरगना और समरकन्द दोनों से ही हाथ धोना पड़ा। स्वयं बाबर के शब्दों में “इस प्रकार मैंने देखा कि फरगना के लिए मैंने समरकन्द का त्याग किया परन्तु फरगना भी मेरे हाथ न लगा।”
फरिश्ता के अनुसार, “भाग्य की गेंद या शतरंज के बादशाह की भाँति वह इधर-उधर मारा फिरा जैसे कि समुद्र के किनारे कंकड़ धक्के खाते-फिरते।” बाबर निरीह होकर अफगानिस्तान चला आया और अफगानों को परास्त कर काबुल तथा कन्धार पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। बाबर के शब्दों में दूसरे रवि के अन्तिम 10 दिनों में (अक्टूबर, 1504 ई०) लड़े बिना किसी प्रयत्न के सर्व शक्तिमान ईश्वर की अनुकम्पा तथा उदारता के कारण काबूल व गजनी तथा उसके अधीन जिले मेरे अधिकार में आ गये और मैं उनका स्वामी बन गया। एक बार एक बाग में वह मृत्यु की प्रतीक्षा में पड़ा हुआ था किन्तु शीघ्र ही जीवन तथा घन प्राप्त हो गया। उसकी नसों में राजा का रक्त बह रहा था। उसके प्रताप से उसने 1504 ई० में काबुल में अपने लिए एक राज्य निर्माण किया।
बाबर छोटे से साम्राज्य से संतुष्ट न था। बाबर के अनुसार 1504 ई० में काबुल विजय करने के समय से लेकर 1526 ई० तक मेरा विचार सदा ही भारत पर अधिकार करने का रहा। बाबर के सम्बन्ध में बी० ए० स्मिथ ने लिखा है कि, ‘बाबर अपने युग के एशियाई शासकों
में सबसे अधिक प्रतिभाशाली था और किसी भी देश तथा भारत के सम्राटों में उच्च पद पाने योग्य था। फरिश्ता के अनुसार बाबर की आकृति अत्यन्त सुन्दर थी। साथ ही वह मिलनसार था। लेनपुल के शब्दों में काबुल का सम्राट बाबर किसी भी आपत्ति से घबरा जाने वाला नहीं था। | जो कार्य अत्यन्त कठोर होता था वह उसी को करना चाहता था।
बाबर के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) निर्भीक व शारीरिक हृष्ट पुष्टता :–– सर ई० डेन्सन (Sir E Denshon) के अनुसार बाबर की गणना उन व्यक्तियों में की जाती है जो मन मस्तिष्क और शरीर से इतने फुर्तीले हति हैं कि वे कभी सुस्त नहीं बैठते तथा उसके पास सदैव कार्यों को करने के लिए समय रहता है। एक प्रमुख इतिहासकार के शब्दों में दो आदमियों को बगल में दबाकर वह आसानी से किले. की दीवारों पर दौड़ सकता था। डॉ० स्मिथ के अनुसार बाबर अपने समय के एशियाई शासकों में सबसे अधिक विद्वान और आकर्षक शासक था तथा उसको भारत के शासकों में अत्यन्त उच्च स्थान प्राप्त है।
(2)साहस, उत्साह तथा स्फूर्ति का संगम:– बाबर में साहस, उत्साह तथा स्फूर्ति का अनोखा संगम था। प्रसिद्ध विद्वान मैलिसन (Mallison) के अनुसार वह सदैव आनन्द युक्त और अन्तिम सफलता प्राप्ति के उत्साह से उत्साहित रहते हुए साहस और स्फूर्ति से काम लेता रहता था। वह बचपन से ही पितृहौन था और अपने भाग्य की खोज में इधर-उधर भागता रहा, परन्तु अपने अपार साहस के कारण वह आपत्तियों से घबराता नहीं था। डॉ० त्रिपाठी के अनुसार उसने पराजय से कभी हार नहीं मानी और न साहस को हाथ से जाने दिया और जीवन की कठोरताओं से कभी भयभीत नहीं हुआ। उसे कर्म से बड़ा प्रेम था गम्भीर संकटों और युद्धों की भीषणों में वह युक्तिपूर्ण और साधन सम्पन्न बन जाता था।
(3)महत्वाकांक्षी एवं आत्मविश्वासी :— डॉ० त्रिपाठी (Dr. S. R. Tripathi) के शब्दों में बाबर में तुर्की और मुगलों का रक्त को सहन करने की शक्ति तथा फारस वालों का साहस और धावा मारने की प्रवृत्ति सम्मिलित थी। स्वयं बाबर कहा कता था कि मेरे हृदय में विजय की महत्त्वाकांक्षी तथा प्रभुत्व की लालसा हिलोरे मार रही थी इसलिए मैं एक दो परायज से निराश होकर बैठने वाला नहीं था। आगे भी लिखा है कि यदि युद्ध में पराजय भी हुयी तो उससे क्या उससे सब कुछ नहीं खो जाता। दुर्दमनीय इच्छा तथा साहस को कभी खोना नहीं चाहिये।
(4)वीर सैनिक व योग्य सेनापति :– बाबर वीर सैनिक व योग्य सेनापति था। इसका परिचय हमें उसके युद्धों से ही पता चल जाता है ऐन्सन के अनुसार ‘सैनिकों के समान वह युद्धों में निर्भीय बना रहता था तथा सेनापति के रूप में वह बड़ा ही कुशल व्यक्ति था और शत्रु की त्रुटियों को मालूम करने का प्रयत्न करता था।
(5)प्रकृति प्रेमी :— तत्कालीन इतिहासकार अहमद यादगार ने बाबर के प्रकृति प्रेम तथा कला प्रेम के सम्बन्ध में लिखा है कि सम्राट के शासन काल के दूसरे वर्ष यमुना नदी के तट पर एक सुन्दर उद्यान लगाया गया। उसी उद्यान में वह अपने मुगल साथियों तथा मित्रों की संगति में आमोद प्रमोद में अपना समय बिताता और यहीं उसके सम्मुख लाल कापोलों वाली नर्तकियाँ गाना गाती और अपने कला कौशल का प्रदर्शन करती।
(6)कूटनीतिज्ञ:— खनवा के युद्ध में जब राणा संग्राम सिंह ने मुसलमानों को अपनी ओर मिलाकर यह चेष्टा की कि खनवा का युद्ध सम्पूर्ण भारत को बाबर के विरुद्ध हो। तब बाबर ने अपनी कूटनीतिज्ञता चलायी तथा राणा संग्राम सिंह के मुसलमानों को अपनी ओर मिलाने के व लिए जिहाद की घोषणा कर दी।
(7)साहित्य प्रेमी- बाबर साहित्य प्रेती था तथा अपनी रचनायें तुर्की व फारसी भाषा में करता है था, बाबर ने अपनी आत्मकथा को तुर्की भाषा में तुजुके बाबरी तथा, बाबरनामा के माध्यम से लिखा था उसे आपत्निकाल में भी लिखने का समय मिल जाता था। लेनपूल के अनुसार किसी दुःख भरी कहानी के बीच वह शोक कम करने के लिए स्वयं मधुर कण्ठ में कविता करने लगता था। भ्यानक कठिनाइयों और भीषण आपत्तियों के बीच भी उसे अपने दुखों के गीत बनाने और गानें का समय मिल जाता था। युद्ध तथा रात्रि के उत्सव दोनों ही उसके समधुर कण्ठ से निकली है हुई कविताओं से गूंज उठते थे।
(8)कट्टर मुसलमान- प्रो० आर० एस० शर्मा (R. S. Sharma) के अनुसार सब गुणों के होते हुए भी बाबर एक मुसलमान सम्राट था। जब वह हिन्दुओं को मार डालता तो अपने कट्टर अनुयायियों को प्रसन्न करने के लिए उनके सिरों के ढेर लगवाता खनवा के युद्ध में बाबर द्वारा क जिहाद की घोषणा करना उसकी इस्लामी संस्कृति प्रवृत्तियों का द्योतक एवं कट्टर मुसलमान होने का प्रमाण है। वह हिन्दुओं का तथा उनके रीति रिवाजों का कट्टर विरोधी था। उसने अनेक मन्दिरों को तुड़वाकर मस्जिदों का भी निर्माण करवाया था। चन्देरी में मस्जिदों के निर्माण के सम्बन्ध में फरिश्ता (Farista) ने लिखा है कि चन्देरी पर विजय कर लेने के बाद बाबर ने उन मस्जिदरों का पुनः निर्माण कराया, जिन्हें चन्देरी का राजा मेदनी राय की आज्ञा से नष्ट कर दिया. गया था अथवा पशुशालाओं में परिवर्तित कर दिया गया था। स्वयं बाबर के अपने शब्दों में ‘मैंने कुछ काफिरों के गढ़ को इस्लाम के सदन में बदल दिया है।”बाबर की इस प्रवृत्ति की पुष्टि इस कोने से और अधिक स्पष्ट हो जाती है कि ‘बाबर ने हुमायूँ को उपदेश दिया था मेरे पुत्र सिया तथा सुन्नियों को पारस्परिक कलह को सदैव उपेक्षा करते रहना, नहीं तो उससे इस्लाम की जड़ें खोखली हो जायेंगी।’ परन्तु कुछ तथ्य ऐसे भी मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि बाबर कट्टर मुसलमान था।डॉ०
एस० आर० शर्मा के अनुसार ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि उसने धर्म के आधार पर कभी किसी हिन्दू मन्दिर को नष्ट किया हो अथवा हिन्दुओं पर अत्याचार किया हो। स्वयं बाबर ने भी हुमायूँ से कहा था कि तुम्हें चाहिए कि किसी भी सम्प्रदाय के लोगों के धार्मिक स्थानों को नष्ट न करों और सदैव न्यायप्रिय रहो। इससे राजा तथा प्रजा के बीच सम्बन्ध अच्छे रहेंगे और देश में शांति तथा संतोष का राज्य स्थापित रहेगा। बाबर की आत्मकथा (बाबरनामा) से पता चलता है कि उसकी सेना में हिन्दू और मुसलमान दोनों को ही समान स्थान मिलता था। उसने स्वयं लिखा है ’19 सम्वत मंगलवार को मैंने अपने दोनों तुको तथा हिन्दू अमीरों का एक बैठक बुलाई और नदी पार करने के सम्बन्ध में उनका मत लिया।
‘(9)सहृदय शासक:— बाबर एक सहृदय शासक था। स्वयं बाबर के शब्दों में इस्लाम का प्रचार उत्पीड़न की तलवार की अपेक्षा प्रेम तथा उपकार से अधिक अच्छा होगा।
10. स्वाभाविक दायालुता:— इस सम्बन्ध में इतिहासकार असंकिन (Eskin) ने लिखा है। कि उसके चरित्र का अन्त कोई अंग इतना प्रशंसनीय नहीं, जितना कि उनकी एकरूप मानवता और स्वाभाविक दयालुता है। यदि उसके संस्मरणों में यत्रतत्र क्रूर हत्याओं का उल्लेख आता हैतो इसके लिए हमें उसे नहीं बल्कि उसके युग को दोषी ठहराना चाहिए।
11. ईश्वर में विश्वास अपने ईश्वीय विश्वास :— के सम्बन्ध में बाबर स्वयं कहा करता था कि ईश्वर की इच्छा के बिना पता भी नहीं हिलता। हमें चाहिए कि अपने को उसके आश्रय में छोड़कर आगे बढ़ते जायें।
(12)चारित्रिक दुर्बलताएँ :– उपर्युक्त चारित्रिक विशेषताओं के अतिरिक्त बावर चारित्रिक दुर्बलताएँ भी थी
(i) मानवता से दूर :– बाबर में मानवीयता का पूर्ण अभाव था। उसने अपने सभी शत्रुओं को कुरता के साथ तलवार के घाट उतारा था। स्वयं बाबर के अनुसार आगरा पहुँचकर हमें जात हुआ कि हिन्दुस्तान के निवासियों की गणना के अनुसार 40 हजार अथवा 50 हजार व्यक्ति मारे गये।
(ii) शक्ति का पुजारी बावर शक्ति के प्रयोग का समर्थक था। बाबर ने स्वयं एक जगह लिखा है कि जब मुझे ज्ञात हुआ था कि सैनिकों ने बहरा निवासियों पर कुछ अत्याचार किये हैं और उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं तो मैंने एक सैन्य दल भेजा और थोड़े से अपराधी सैनिकों को पकड़वा लिया, कुछ को मैंने तलवार के घाट उतार दिया और कुछ को नाक कटवाकर शिविर में घुमाया।
(iii) क्रूरतापूर्वक व्यवहार बावर एक कर शासक था। उसकी कुरता का ज्वलन्त उदाहरण चन्देरी विजय में मिलता है। कनवाह के युद्ध में भी असंख्यों राजपूतों का वध करके बाबर ने अपनी क्रूरता का परिचय दिया था।
(iv) मदिरा का सेवन:— बाबर मंदिरापान भी करता था जिसके कारण स्वभाव में मादकताआना स्वाभाविक था और इसी कारण वह कभी-कभी क्रूर से क्रूर कार्य भी कर बैठता था। अन्त में कहा जा सकता है कि उसको क्रूर कहा जाना सत्य नहीं है, क्योंकि उसकी ईश्वर में आस्था इस बात का द्योतक है, कि पूर्णतया धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। बाबर के सम्बन्ध में लेनपूल ने तो यहाँ तक लिखा है कि ‘वह भारत और मध्य एशिया तथा लुटेरों को टोली और एशिया की श्रेष्ठ सरकारों के मध्य एक कड़ी समान था। उसकी नसों में चंगेज खाँ और तैमूर का रक्त प्रवाहित था। खानाबदोश तारियों के साहस और सजगता के साथ उसमें फारस वालों की संस्कृत और शिष्टता पर्याप्त रूप से विद्यमान थी।

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