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सिन्दूर की होली की संवाद योजना की समीक्षा करें

सिन्दूर की होली की संवाद योजना:--




संवाद नाटक का एक महत्वपूर्ण तत्व है, उसी की सहायता से नाटक साहित्य विधा का सृजन होता है। अतः संवादों को कलात्मक और नाटक की भावना के अनुकूल होना चाहिए। कथावस्तु को विकसित करने की सामर्थ्य, चरित्रों को दर्शाने की क्षमता, पात्रों की मनोदशा का चित्रण करने की योग्यता, भावी तथा विगत् घटनाओं का सूचक तथा कथा और भाव का निर्वाह करने में सफलता संवादों का आवश्यक गुण है।

संवाद की दृष्टि से दुखांत नाटकों और समस्या नाटकों में अन्तर को सदैव दृष्टिगत रखना चाहिए। दुखांत नाटक में संवाद श्रुति-मधुर तथा काव्यात्मक होते हैं। उनमें भावुकता, आवेग की बहुलता, कल्पना, भावनात्मक आहह्लाद और अन्तर्वृत्तियों के उद्वेग में चित्त को रमाने तथा उलझान की शक्ति होती है। 

परन्तु उनमें जीवन के अनावृत्त आख्यानों में गहराई तक उतर कर सामाजिक प्रश्नों के हल ढूँढने का प्रयास तथा जीवन की सच्चाई को दर्शाने की क्षमता नहीं होती है, भले ही जीवन पर रहस्य का आवरण तथा माधुर्य की परत लगा दी जाए। इस अभाव की पूर्ति समस्या नाटकों द्वारा संवादों के माध्यम से की गयी। संवाद का चुस्त, कसा हुआ होना इन नाटकों का प्रमुख आकर्षक तत्व है। इन संवादों में सहजता, सादगी तथा सरलता इनकी प्रमुख विशेषता है।

सिन्दूर की होली' श्री लक्ष्मी नारायण मिश्र का एक समस्या नाटक है। समस्या नाटकों में संवाद को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। शास्त्रीय नाटकों में जो स्थान कथावस्तु के संघटन का है और दुखात नाटकों में क्रिया व्यापार का है, वही स्वान समस्या नाटकों में संवाद का है। दुखांत नाटकों में क्रिया व्यापार के माध्यम से नाटक के प्रतिपाद्य की जानकारी मिलती है, परन्तु समस्या नाटकों में लेखक के मन्तव्य को प्रकट करने के लिये पात्र विशेष द्वारा संवाद कहलाये जाते हैं।


समस्यानाटकों में संवाद द्वारा प्रतिपाद्य को प्रस्तुत किया जाता है। संवाद ही समस्या नाटकों की रीढ़ है। यद्यपि उनमें सांकेतिकता होती है, फिर भी वह इतनी गहन और स्पष्ट होती है कि उनसे एक साथ अनेक विचारों, भावों, स्थितियों और पर्यावरण का प्रकटीकरण होता रहता है। इससे स्पष्ट है कि समस्या नाटकों में संवादों का विशेष महत्व  सिन्दूर की होली' नाटक की संवाद- योजना में नाटककार को पूर्ण सफलता मिली है। संवाद नाटकीयता से परिपूर्ण है।


 तर्क-वितर्क सम्बन्धी संवाद अपेक्षाकृत लम्बे है, परन्तु उनके मध्य में मूक अभिनयात्मक मुद्राओं के रंग-संकेत दिये गये हैं, जिनसे रूक्षता का कुछ हद तक निवारण हो जाता है। कथोपकथन की शैली विचार-विमर्श। मूलक अधिक है, परन्तु संवेगों से परिपूर्ण होने के फलस्वरूप जीवन्तता आ गयी है। 'सिन्दूर की होली' अर्द्ध-उक्तियाँ पात्रों के कथन की संवेगात्मकता को दर्शाती है।



'सिन्दूर की होली में फ्रायडवाद :--


सिगमंड फ्रायड का जन्म चेकोस्लोवाकिया के एक छोटे कस्बे फ्रीडबर्ग में 6 मई, 1856 को हुआ था। सन् 1881 में एम0डी0 की उपाधि प्राप्त करके वह वियेना में चिकित्सा कार्य करने लगे। फ्रायड ने स्नायुरोगिकी (न्यूरोपैथोलॉजी) में विशेषज्ञता प्राप्त की थी। परन्तु स्नायुरोगियों के इलाज से जीविका चलना कठिन था। 


इसलिये उन्होंने विद्युत चिकित्सा और सम्मोहन को अपनाया। बाद में सन् 1886 से 1891 तक वे सम्मोहन से ही हिस्टीरिया का इलाज करते रहे और इसमें उन्हें अच्छी सफलता भी मिली, परन्तु उसका परिणाम अस्थायी रहता था। यहाँ से उनकी मनोविश्लेषण सम्बन्धी खोज आरम्भ हुई। इस दिशा में आगे चलते-चलते उन्होंने अपने प्रेक्षणों के आधार पर जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया वह आज "फ्रायड के मनोविश्लेषण सम्बन्धी सिद्धान्त" या 'फ्रायडवाद' के नाम से प्रसिद्ध है।


उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में मानव चिन्तन को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली चार विभूतियाँ है; मार्क्स, डारविन, महात्मा गांधी और सिंगमण्ड फ्रायड इनमें से फ्रायड ने मन और उसके अवेतन व्यापारों के जो रहस्य उद्घाटित किये और अपनी खोजों के आधार पर हजारों स्नायुरोगियों को स्वस्थ करके जो नई चिकित्सा शैली स्थापित की, उसका चिकित्सा जगत के साथ-साथ मानवीय अध्ययन की अन्य शाखाओं पर भी क्रान्तिकारी प्रभाव पड़ा है। हिन्दी आलोचना साहित्य में भी फ्रायड के साहित्य विषयक विचारों को लेकर बहुत खंडन-मंडन हुआ है।

श्री लक्ष्मी नारायण मिश्र के अधिकांश नाटकों में यौन सम्बन्धी प्रवृत्तियों और काम समस्याओं को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। सिन्दूर की होली' नाटक में भी प्रमुख समस्या यौन समस्या है। यौन समस्या में विवाह से पूर्व की समस्या, बाल-विवाह, विधवा-विवाह, तलाक और चिरन्तन नारीत्व की समस्या पर प्रकाश डाला गया है।


विवाह से पूर्व की समस्या :--


चन्द्रकला अपने पिता द्वारा प्रस्तावित मनोजशंकर को पति स्वीकार नहीं कर पाती। वह विवाह में स्वतन्त्रता का पक्ष लेती है। नाटककार ने इस तथ्य को स्पष्ट किया है। कि आज समाज में शिक्षित लड़कियां इस क्षेत्र में स्वतन्त्रता चाहती है। स्वतन्त्रता की झोंक में वे अपनी 

तथा तथाकथित मान्यताओं को ओढ़कर आरोपित अभिशापो  तक को अपनाने के लिए तैयार हो जाती है



बाल-विवाह की समस्या  :--

नाटककार ने इस समस्या का पृथक रूप से उल्लेख नहीं किया है किन्तु मनोरमा के चरित्र से दर्शक स्वतः इसे अनुभव करने लगता है। मनोरमा का विवाह बाल्यावस्था में ही हो जाता है। 

इस आयु में विवाह के विषय में कुछ ज्ञात नहीं होता है। समाज में यह कुरीति आज भी विद्यमान है। नाटककार ने इसके पक्ष या विपक्ष में कहीं भी अपना मत नहीं दिया है, जिससे स्पष्टतः यह ज्ञात हो सके कि उसकी अपनी स्थापना क्या है? फिर भी वह बाल विवाह का समर्थक तो कतई प्रतीत नहीं होता है।



विधवा-विवाह की समस्या :-


विधवा-विवाह की समस्या का तर्कपूर्ण विवेचन नाटक में कुशलता से किया गया है। इसका विवेचन मनोज मनोरमा और मनोरमा मुरारीलाल के माध्यम से हुआ है। मनोरमा बाल विधवा है।

 किन्तु विधवा-विवाह के पक्ष में नहीं है। वह इसे नारी की प्रकृति के प्रतिकूल मानती है। मनोज और मुरारीलाल विधवा-विवाह के पक्ष में हैं और मनोरमा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखते हैं।

समाज में विधवा-विवाह की समस्या आज भी उग्र रूप में विद्यमान है, किन्तु नाटककार स्वयं विधवा-विवाह के पक्ष में नहीं दिखता। यद्यपि उसने विधवा-विवाह के विधेयात्मक और निषेधात्मक दोनों ही पक्षों पर विचार दिया है। किन्तु विजय निषेधात्मक पक्ष की हुई है। 

इससे स्पष्ट है कि लेखक परम्परागत आदर्शों का ही पोषक हैं। यह 'वास्तव में समस्या नाटक के विधान की दृष्टि से दोष ही है। तो भी आज के बुद्धिवादी वर्ग के लेखक को यह स्वीकार नहीं है।


      तलाक की समस्या:-

विधवा-विवाह की समस्या के साथ-साथ तलाक की समस्या का उल्लेख भी नाटक में हुआ है। नाटककार का मत है कि विधवा-विवाह के प्रारम्भ से तलाक की • समस्या का प्रवेश हो जायेगा। तलाक की समस्या वहीं उत्पन्न होती है, जहाँ एक के स्थान पर अनेक विवाह होने लगते हैं। नाटककार की दृष्टि में तलाक एक ऐसी बीमारी है जो समाज को निगल जाती है। मनोरमा एक स्थल पर कहती है



चिरन्तन नारीत्व की समस्या :----


बाल-विधवा मनोरमा अपने प्रिय के प्रेम की वैयक्तिक अनुपस्थिति में भी सामाजिक आदर्शों के अनुकूल निर्वाह करती है। अपने मन को संयम के द्वारा मर्यादाओं के मार्ग पर चलाती है। दूसरी ओर चन्द्रकला सामाजिक मर्यादाओं की अवहेलना कर अपने मन की अनुभूति एवं परितोष को ही प्राथमिकता देती है। 

एक ओर सामाजिक मर्यादा की पराकाष्ठा है तो दूसरी ओर वैयक्तिक परितोष की नाटककार ने समस्या के प्रत्येक पहलू को उलट-पुलट कर देखा है और सामंजस्य की नीति से, तटस्थता की नीति से, तटस्थ भाव से एक मार्ग निर्देशित किया है। इस समस्या के चित्रण में नाटककार मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी सफल रहा है।




सिन्दूर की होली का वस्तु विवेचन :---


कथ्य और कथावस्तु नाटक के तत्वों में सबसे अधिक प्रमुख एवं मूल विधायक तत्व होता है। समस्या नाटकों में कथानक के स्थूल रूप पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है ! फिर भी उसका स्वरूप तो रहता ही है।

 समस्या नाटक के कथानक का आयाम आर्दशवादी नाटकों के इतिवृत के समान नहीं होता है, उसकी वस्तु योजना भी के अलग प्रकार की होती है। 

समस्या नाटक के वस्तु विन्यास में कार्य अवस्थाओं और के नाट्य-संधियों की कता नहीं होती है। उसमें सम-सामयिक जीवन की किसी समस्या के परिप्रेक्ष्य में पात्रों और पति के परस्पर मात-प्रतिभा द्वारा कथा वस्तु का निर्माण किया जाता है।

'सिन्दूर की होली लक्ष्मी नारायण मित्र के समस्या नाटकों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण रचना है। इस नाटक की कथावस्तु नाटक के शिल्प-विधान के अनुसार तीन अंकों में विभाजित है। अंकों में दृश्य-परिवर्तन का विधान नहीं किया गया है। प्रथम अंक मे सदयगत समस्याओं का बीजारोपण हुआ है। दूसरे अंक में समस्या से सम्बन्धित उलझनों का विकास हुआ है और तीसरे अंक में उन पर विचार-विमर्श किया गया है।


 इस प्रकार से नाटक का कथानक सरल है तथा इसमें तार्किक क्रमवद्धता है। समस्याओं के प्रकटीकरण, नाट्य व्यंग्यों के अवतरण प्रवेश स्थानों की कुशल योजना, चारित्रिक विशिष्टता और मनोविज्ञान सम्मत अभिनव प्रयोगों द्वारा वस्तु की गति के विकास को बनाये रखने में नाटककार को सफलता मिली है। कथानक में ऐसे स्वत बहुत कम देखने को मिलते है जहाँ तार्किक स्थिति होने के कारण रंगमंचीय गत्यावरोध प्रकट हुआ हो अथवा रंगमंच गोष्ठी का रूप ले लेता हो।


 इस प्रकार का दोष समस्या नाटकों में प्रायः आ जाता है। आदि से अन्त तक वस्तु योजना का गतिशील बना रहना इसकी एक बहुत बड़ी विशेषता है। आगरूक पाठक उसमें निरन्तर बुद्धि-रस का आस्वादन करता रहता है।


 सिन्दूर की होली में नाटकीय प्रतिव्यं द्वारा भी कथानक के विकास का प्रयत्न परिलक्षित होता है। आरम्भ में ही मुरारीलाल का यह कथन- "मनोज अगर जान जायेगा की उसके पिता ने मेरी वजह से आत्महत्या की थी. (चुप होकर जैसे किसी गहरी चिन्ता में पड़ जाता है) दस वर्ष का समय गया अभी तक जो त छिपी हुई है। लेकिन अगर किसी दिन खुल गई तो मेरे मुँह पर स्याही पुत्र जारंगी और मैं किसी कामका नहीं रहूँगा।

कथानक की परिणति की ओर इंगित करने वाला एक कलात्मक नाटकीय प्रतिव्यग्य है। व्यंग्य-विनोदपूर्ण उक्तियों में नाटक को बनाने का प्रयत्न प्रशंसनीय है। मनोज तथा मनोरमा के कथनों में यह प्रवृत्ति मिलती है। बुद्धिवादी प्रेक्षक के लिए कथानक योजना की यह कला अधिक द्र एवं रोचक होती है।

कंमानक में स्वगत-कथनों या गीत का आश्रय न लेकर मूक अभिनयों अथवा मनोवैज्ञानिक मुद्राओं को आधार बनाया गया है। सिन्दूर की होती की वस्तु योजना की सर्वाधिक सफलता और विशेषता यह है कि यहाँ अनावश्यक कुछ भी प्रतीत नहीं होता है। सभी कुछ एक सुघड़ साँचे में ढला हुआ है।



Note: -----(विशेष )चन्द्रकलाके माध्यम से समाज में स्त्रियों की मानसिकता का वर्णन है जिसके कारण स्त्री स्वयं पुरुषों के अधीन रहकर उनकी गुलामी स्वीकार करती है।


कर्मभूमि' उपन्यास के आधार पर सुखदा का चरित्र चित्रण करें


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