कर्मभूमि' उपन्यास के आधार पर सुखदा का चरित्र चित्रण करें
सुखदा :-
कर्मभूमि' :--प्रेमचंद्र की राजनीतिक उपन्यास है
सुखदा 'कर्मभूमि' उपन्यास को नायिका है। इस उपन्यास में यह एक महत्वपूर्ण पात्र है। वह लाला समरकान्त की बहू और अमरकान्त की पत्नी है। रेणुका देवी इसकी माँ है। वह एक आदर्श भारतीय नारी है। उसका चरित्र इस उपन्यास में कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। उसके चरित्र में उतार चढ़ाव भी हैं। उसमें नारी चरित्रगत सभी गुण पाये जाते - वह अपने गुण के कारण ही उपन्यास में चर्चित एवं विशिष्ट स्थान प्राप्त करती है।
सुखदा का विचार अपने पति अमरकान्त से मेल नहीं खाता। उसे भोग-विलास में विशेष रुचि है जो उसके पति को पसन्द नहीं है। बड़े घराने की बेटी होने के कारण धन को वह अपने श्वसुर की भाँति अधिक महत्व देती है, जबकि उसका पति धन से अधिक सेवा को महत्व देता है। सुखदा अपने पति से ज्यादा समझदार है- अमरकान्त उसके प्रभाव के सामने अपने को होन समझता है। ऐश्वर्य में पली होने के कारण सुखदा में एक रौब है।
वह एक आदर्श पत्नी की तरह अमरकान्त को व्यापार की जिम्मेदारी सम्भालने की भी बात करती है। इससे पति-पत्नी में तकरार होता रहता है। दोनों एक छत के नीचे रहते हैं किन्तु दोनों के विचार भिन्न हैं। सुखदा धन की उपासिका है, उसके श्वसुर लाला समरकान्त भी धन के उपासक हैं। वह नाज-नखरे वाली सुन्दरता की देवी है।
सुखदा स्वतंत्र विचारों में जीने वाली नारी है इसका कारण उसका लालन-पालन ही ऐश्वर्य के बीच हुआ है। वह अपनी विधवा माँ की अतुल सम्पत्ति की अकेली वारिस है। अत: उसके लिए त्याग, करुणा, दया और सेवा कुछ मायने नहीं रखता।
भौतिक सुख ही उसके जीवन का उद्देश्य है। अपने इसी विचार के कारण वह प्रारम्भ में अपने पति अमर के त्याग के महत्व को बिल्कुल नहीं समझ पाती। कॉलेज से लौटने के पश्चात अमर चर्खा लेकर बैठता है, इससे वह अप्रसन्न होती है। वह अपने अमीर खानदान के गर्व के कारण अमर को महत्व नहीं देती थी, किन्तु समय बीतने के साथ-साथ उसे अपनी गलती का एहसास होता है। वह सकीना के पास बार-बार जाकर अपना आत्म-निरीक्षण करती है। सकीना से वह अत्यधिक प्रभावित होती है तथा उससे त्याग और प्रेम का पाठ भी सीखती है।
सुखदा एक स्वाभिमानी स्त्री है। वह अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए हर कष्ट झेलने को तैयार है। जब श्वसुर से दूर होने की बात उठती है तब वह अपनी माँ रेणुका के निमन्त्रण को अस्वीकार कर अपने पति के साथ रहना पसन्द करती है।
सुखदा के चरित्र में एक विशिष्ट विशेषता यह है कि उसमें समझदारी प्रचुर मात्रा में है जिससे वह सभी को अपने में मिलाये रखने में सक्षम होती है। वह रुपवती गुणवती होने के साथ-साथ चतुर भी है।
अपने वाक् चातुर्य व तर्कों से अमरकान्त और समरकान्त को हरा देती है। समरकान्त तो हमेशा ही उससे प्रभावित रहते हैं। अमरकान्त जो दुकान पर बैठना ही नहीं चाहता था उसे भी वह दुकान पर बैठा देने की शक्ति रखती है।
सुखदा परिस्थिति से घबड़ाती नहीं बल्कि उसे अपने अनुरूप ढाल लेती है। वह नाट्य साहित्य अपने पति का साथ देती है परन्तु उसमें अपने परिवार के प्रति दायित्व का भी बोध है। सुखदा को जब समरकान्त की बिगड़ी दशा को जानकारी मिलती है तो वह अमर की परवाह किए बगैर उनकी सेवा करती है। उन्हें अपने हाथों से खाना बनाकर खिलाती है। वह व्यवहार कुशल है।
वह समझती है कि श्वसुर की सेवा करना उसका दायित्व है इसीलिए वह पति की नाराजगी की चिन्ता नहीं करती। एक स्थल पर वह शान्ति कुमार से कहती है- "वह मुझे विलासिनी समझते थे, पर मैं कभी भी विलास की लौंडी नहीं रही। हाँ दादा जी को स्पष्ट नहीं कहना चाहती थी। यही बुराई मुझमें थी।"
नारी जाति के प्रति सहानुभूति सुखदा की सबसे बड़ी विशेषता है। मुन्नी की घटना से वह विचलित होती है उसके अपमान को वह पूरी नारी जाति का अपमान समझती है। उसे बचाने में वह पूर्ण रूप से सहयोग करती है। अपनी माँ रेणुका देवी से वह 5000/- चंदा लेती है। वह रुपया मुन्नी के मुकदमा पर खर्च होता है।
मुन्नी का मुकदमा बहुत कुछ उसके सहयोग से ही लड़ा गया था। यहाँ उसके निर्मल नारीत्व का प्रखर रूप में दर्शन होता है। इसी प्रकार सकीना के प्रति भी उसमें दया की भावना है पति से अप्रसन्न रहने पर भी सुखदा सकीना को हमेशा सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से देखती है।
सुखदा क्रान्तिकारी विचारों वाली युवती है। गरीबों के प्रति वह विशेष सहानुभूति रखती है। इस उपन्यास में वह दया की देवी के रुप में सामने आयी है। वह निर्भीक है। वह गरीबों को उनकी जमीन का हक दिलवाने के लिए घर से बाहर निकल आती है।
वह लोगों में अधिकार की चेतना जागरुक करती है भाषण देती है। वह उन गरीबों का नेतृत्व करती है। सुखदा अपने दयावान चरित्र से सारे शहर में लोकप्रिय हो जाती है। उपन्यासकार उसे नगर की नेत्री कहते हैं। वह एक कुशल और बहादुर नारी है, नगर का प्रत्येक कार्य उसी के हाथों होता है वह भी प्रत्येक कार्य को जिम्मेदारी से निभाती है।
आन्दोलन और हड़ताल आदि सभी उसी की प्रेरणा से सम्भव होते हैं। समरकान्त की अछूत विरोधी प्रवृत्ति को देखकर उनके सामने ही सुखदा जनता को आन्दोलन के लिए ललकारती है और उन्हें इस बात के लिए बाध्य करती है कि वे उन्हें मन्दिर में प्रवेश करने दें।
सुखदा किसी के सामने झुकना नहीं जानती। वह धनीराम के बेटे मनीराम से भी टकरा जाती है। मनीराम के विचारों को जानकर उसे नैना के लिए भी दुःख होता है। वह उसे सहभागिनी का अर्थ समझाने का प्रयास करती है लेकिन मनीराम मुँहफट था "उसका विनोद भी गाली से शुरु होता था और गाली थी ही।" मनीराम सुखदा पर व्यंग्य करता है -
"कम से कम आपको इस विषय में मुझे उपदेश देने का अधिकार नहीं है। आपने इस शब्द का अर्थ समझा होता, तो इस वक्त आप अपने पति से अलग न होंती और न वह गली-कूंचों की हवा खाते होते।" उसके इस कथन से सुखदा क्रोधित होकर कठोर स्वर में कहती है :-
"मेरे विषय में आपको ठीका करने का कोई अधिकार नहीं है, लाला मनीराम जरा भी अधिकार नहीं है। आप अंग्रेजी सभ्यता के बड़े भक्त बनते हैं। क्या आप समझते हैं कि अंग्रेजी पहनावा और सिगार ही उस सभ्यता का मुख्य अंग है? उसका प्रधान अंग है, महिलाओं का आदर और सम्मान वह अभी आपको सीखना बाकी है। कोई कुलीन स्त्री इस तरह आत्म सम्मान खोना स्वीकार न करेगी।"
इस प्रकार सुखदा अपने आत्म-सम्मान की पूर्ण रक्षा करती है। आत्म निर्भरता और साहस का भी परिचय उसने बराबर दिया है। घर का खर्च चलाने के लिए वह जज साहब की पत्नी की सिफारिश से रुपये 5/- मासिक पर एक बालिका विद्यालय में अध्यापन का कार्य भी करती है।
सुखदा किमी की आलोचना पर ध्यान नहीं देती। छोटी जाति के लोगों को उत्तेजित कर व्यापक हड़ताल कराने के अभियोग में वह जेल भी जाती है, वहाँ अपने पति के समान वह भी मामूली कैदियों के साथ रहती है। सुखदा के इस कार्य से अमरकान्त अत्यंधिक प्रभावित होता है, उसके मन में सुखदा के लिए श्रद्धा का भाव उपजता है।
उसे विश्वास नहीं था कि सुखदा क्रांतिकारी नारी के रुप में समाज के सामने उपस्थित होगी। वह भी सभी की भाँति उसकी इज्जत करने लगता है। अन्त में उसके श्वसुर लाला समरकान्त भी उसकी बहादुरी से प्रसन्न होते हैं उसे मदद भी करते हैं इससे उन्हें गर्वको अनुभूति होती है। सुखदा का पूर्ण विश्वास है कि न्याय की जीत हमेशा होती है।
इस प्रकार सुखदा एक आदर्श नारी है। उसका त्यागमयी चरित्र प्रशंसनीय है। सुखदा के चरित्र में श्रद्धा, प्रेम, करुणा, बलिदान की भावना और स्वाभिमान है जो उसके चरित्र को उज्जवलता प्रदान करता है।

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