व्हीटस्टोन सेतु (WHEATSTONE BRIDGE) :-
इंग्लैण्ड के वैज्ञानिक प्रो. व्हीटस्टोन ने प्रतिरोधों की एक विशेष व्यवस्था का आविष्कार किया जिसके द्वारा किसी चालक का प्रतिरोध ज्ञात किया जा सकता है।
इस व्यवस्था को व्हीटस्टोन-सेतु कहते हैं।
इसमें चार प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में जोड़कर एक चतुर्भुज बनाते हैं ।
इस चतुर्भुज के एक विकर्ण में एक धारामापी तथा दूसरे विकर्ण एक में सैल जोड़ देते हैं।
अब यदि चतुर्भुज की चारों भुजाओं के प्रतिरोधों को इस प्रकार समायोजित किया जाए कि सैल द्वारा सेतु में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर धारामापी में कोई विक्षेप न हो तो सेतु को सन्तुलित कहा जाता है।
इस स्थिति में चतुर्भुज की किन्हीं दो संलग्न भुजाओं के प्रतिरोधों का अनुपात शेष दो संलग्न भुजाओं में लगे प्रतिरोधों के अनुपात के बराबर होता है।
चित्र (6.17) मे चार प्रतिरोध P Q R तथा S चतुर्भुज ABCD की चार भुजाओं के रूप में जुड़े होते हैं!
B और D के बीच में एक सुग्राही धारामापी तथा A तथा C के बीच में एक सैल लगा है। K, और K, दो कुन्जिया है। जब कुन्जी K को दबाकर सैल से धारा प्रवाहित की जाती है।
तो बिन्दु A पर यह धारा दो भागों में बंट जाती है। एक भाग , भुजा AB में तथा दूसरा भाग ,, भुजा AD में प्रवाहित होता है।
प्रतिरोधों P Q R S के मान इस प्रकार समायोजित किये जाते हैं कि K, को दबाने पर धारामापी G में कोई विक्षेप न हो स्पष्ट है कि इस दशा में विकर्ण BD में कोई धारा नहीं होगी।
अतः भुजा BC में वही धारा , होगी जो भुजा AB में है, तथा भुजा DC में वही धारा में होगी जो भुजा AD में है।
इस सूत्र से स्पष्ट है कि यदि प्रतिरोधों Pव Q का अनुपात तथा प्रतिरोध R का मान ज्ञात हो तो अज्ञात प्रतिरोध S की गणना की जा सकती है।
यही कारण है कि Pतथा Q भुजाओं को अनुपाती भुजाएं (Ratio Arms), भुजा AD को 'ज्ञात भुजा (Known Arm) तथा भुजा CD को 'अज्ञात भुजा' (Unknown Arm) कहते हैं।
सेतु के सन्तुलित होने पर धारामापी तथा सेल की स्थितियों को आपस में बदलने पर सेतु की सन्तुलन अवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अतः सेतु की BD तथा AC भुजाओं को संयुग्गी भुजाएं' (Conjugate Arms) कहते हैं।
व्हीटस्टोन सेतु के सिद्धान्त पर आधारित इसके दो अनुप्रयोग (Applications) है
(i) पोस्ट ऑफिस बॉक्स (ii) मीटर से
6.10.1 पोस्ट ऑफिस बॉक्स (Post-office Box)
यह उपकरण पहले डाकघरों में टेलीफोन अथवा टेलीग्राम के तारों का प्रतिरोध ज्ञात करने या तार के टूट जाने की स्थिति का पता लगाने के काम आता था।
चित्र 6.18 पोस्ट ऑफिस बॉक्स -
पोस्ट ऑफिस बॉक्स एक प्रतिरोध बॉक्स की भांति होता है !
जिसमें - दो अनुपाती- भुजाएं (Ratio arms) AB व BC श्रेणीक्रम में जुड़ी होती हैं.
(चित्र 618) | इन भुजाओं में से प्रत्येक में 10, 100 व 1000 ओह्म के प्रतिरोध लगे होते हैं।
तीसरी ज्ञात भुजा AD में । ओह्म से 5000 ओह्म तक के प्रतिरोध U आकृति की पंक्ति में लगे होते हैं।
AC व BD भुजाओं में एक-एक कुंजी लगाने के लिए A का सम्बन्ध दाब कुंजी K, से, तथा B का सम्बन्ध दाब कुंजी K, से होता है।
जिस तार का प्रतिरोध (S) अथवा विशिष्ट प्रतिरोध निकालना होता है उसे अज्ञात भुजा CD में जोड़ देते हैं।
धारामापी G को कुंजी K, के द्वारा B व D के बीच, तथा सैल E को कुंजी K, के द्वारा A व C के बीच जोड़ देते हैं।
प्रयोग विधि तार के प्रतिरोध S का मान निकालने के लिये अनुपाती भुजाओं AB व BC से 10-10 ओह्म के प्रतिरोध प्लग निकाले जाते हैं।
इससे इन भुजाओं के प्रतिरोधों P Q का अनुपात 11 हो जाता है। अब ज्ञात भुजा AD में से किसी प्रतिरोध R का प्लग निकालकर पहले सैल- कुंजी K, को तथा - फिर धारामापी की कुंजी K, को दबाते हैं।
इससे धारामापी में विक्षेप उत्पन्न होता है। R का मान उत्तरोत्तर बढ़ाते हुए एक के अन्तर में दो ऐसे प्रतिरोध ज्ञात कर लेते हैं!
जिनके लिए पहले K, को तथा फिर K, को दबाने पर धारामापी में विपरीत दिशाओं में विक्षेप उत्पन्न हो अज्ञात प्रतिरोध का मान, R के इन दो प्रतिरोधों के बीच होगा।
अब P का मान 100 ओह्म कर देते हैं तथा Q का 10 ओह्य ही रहने देते हैं जिससे कि P Q का अनुपात 10:1 हो जाता है।
AD भुजा में पुनः उत्तरोत्तर ऐसे दो प्रतिरोध ज्ञात करते हैं जिनके मान पहले दोनों प्रतिरोधो के 10 गुने के बीच में हो, तथा पहले कुंजी K, तथा फिर कुंजी K, को दबाने
पर धारामापी में विक्षेप विपरीत दिशा में हो। इससे अज्ञात प्रतिरोध S का मान दशमलव के एक अंक तक ज्ञात हो जाता है।
अन्त में P Q का अनुपात 100:1 करके, R का ऐसा मान ज्ञात करते हैं कि धारामापी में कोई विक्षेप न हो। अविक्षेप स्थिति के लिए धारामापी का शन्ट हटा देते हैं।
इससे S का मान दशमलव के दो अंकों तक ज्ञात हो खिसद जाता है। तार की लम्बाई (/) मीटर पैमाने से तथा तार की त्रिज्या (r) पेंचमापी) से ज्ञात करके, तार के पदार्थ के विशिष्ट प्रतिरोध (p) की गणना निम्न सूत्र ही विभ द्वारा कर लेते हैं-
यदि / वr सेमी में हो तो p का मान ओह्य-सेमी में प्राप्त होगा।
मीटर-सेतु (Meter Bridge):-
किसी चालक (तार) का प्रतिरोध ज्ञात करने के लिए व्हीटस्टोन सेतु के सिद्धान्त पर आधारित मीटर-सेतु एक सुग्राही यन्त्र है। इसकी सुग्राहिता पोस्ट ऑफिस बॉक्स की अपेक्षा बहुत अधिक होती है।
मीटर सेतु चित्र (6.19) में दिखाया गया है। AC, 1 मीटर लम्बा मैगनिन अथवा कॉन्सटैन्टन का एक तार है जो एक लकड़ी के आधार पर पैमाने के सहारे कसा हुआ है।
तार के अनुप्रस्थ-काट सब जगह एकसमान हैं। तार के सिरे A व C, दो L के आकर में मुड़ी हुई तांबे की पत्तियों से जुड़े हैं!
जिनके सिरों पर सम्बन्धक-पेंच लगे हैं। इन पत्तियों के बीच में दोनों ओर कुछ रिक्त स्थान छोड़कर एक तीसरी तांबे की पत्ती है!
जिस पर तीन सम्बन्धक पेंच लगे रहते हैं। बीच वाले पेंच D को एक शन्टयुक्त धारामापी •G से जोड़कर सर्पी कुंजी (Sliding Jockey) B से जोड़ देते हैं !
जिसकी नोंक को तार पर खिसकाकर कहीं भी स्पर्श करा सकते हैं।
प्रयोग विधि :- (Practical Method): जिस तार का प्रतिरोध (S) ज्ञात करना होता है!
उसे बिन्दुओं C और D के बीच के रिक्त स्थान में, तथा एक प्रतिरोध बॉक्स A व D के बीच के रिक्त स्थान में लगा देते हैं।
Aव C के एक सैल, धारा-नियन्त्रक तथा कुन्जी K सम्बन्धक पेचों के द्वारा जोड़ || प्रयोग में जब सर्पी-कुन्जी, सेतु के तार AC को किसी बिन्दु B पर
छूती है तो तार दो भागों में बंट जाता है। ये दो भाग AB तथा BC, व्हीटस्टोन सेतु के P तथा Q प्रतिरोधों का कार्य करते हैं।
सबसे पहले प्रतिरोध बॉक्स में से कोई प्रतिरोध R निकालते हैं तथा कुन्जी K को बन्द कर देते हैं।
अब सर्पी-कुन्जी को तार के सहारे खिसकाकर ऐसी स्थिति प्राप्त करते हैं!
कि कुन्जी को तार पर दबाने से धारामापी G में कोई विक्षेप उत्पन्न न हो।
इस स्थिति में बिन्दु B व D एक ही विभव पर है तथा बिन्दु B को 'शून्य - विक्षेप स्थिति (Null Deflection Point) कहते हैं।
तार के दोनों भागों, AB व BC की लम्बाईयां पैमाने पर पढ़ लेते हैं।
माना तार की AB लम्बाई का प्रतिरोध P तथा BC लम्बाई का प्रतिरोध Q है। तब व्हीटस्टोन सेतु के सिद्धान्त से
R, प्रतिरोध-बॉक्स से निकाला गया प्रतिरोध है तथा /, AB की लम्बाई को प्रदर्शित करता है।
अतः इस सूत्र से प्रतिरोध S का मान ज्ञात कर सकते हैं।
लिये प्रतिरोध-बॉक्स से भिन्न-भिन्न प्रतिरोध निकालकर कई प्रेक्षण जाते हैं तथा प्रत्येक प्रेक्षण के लिये S का मान ज्ञात करते हैं।
इसके पश्चात् अज्ञात प्रतिरोध S तथा प्रतिरोध-बॉक्स के स्थानों को आपस में बदलकर प्रयोग को दोहराते हैं।
गणना में दोनों बार के प्रयोगों से प्राप्त S के मानों का माध्य ज्ञात करते हैं।

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