रैगिंग
इधर कुछ वर्षों से यह शिक्षा संस्थानों में एक बड़ा
आतंक बनकर उभरा है।
कहा जाता है कि रैगिंग की शुरुआत छात्रों के कल्याण के लिए की गयी थी।
नये छात्र महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नहीं के बराबर स्पष्टवादिता के साथ आते थे।
वे अपनी समस्याएँ व्यक्त करने से कतराते थे।
वरिष्ठ छात्र कुछ हास्यपूर्ण प्रश्न पूछकर एक तरह का मजाकिया साक्षात्कार आयोजित करते थे।
इसने एक प्रथा का रूप ले लिया है, जिसमें अबतक गिरावट ही आती रही है।
छात्र इस शब्द की चर्चा से ही काँप उठते हैं।
रैगिंग एक तरह की अनावश्यक सजा के तौर
पर जाती है।
कनिष्ठ छात्रों को देर तक गाने और नाचने के लिए खासकर अपनी मर्जी के खिलाफ बाध्य किया जाता है।
उन्हें धूम्रपान करना और शराब पीना पड़ता है।
कुछ मामलों में उन्हें पेशाब पीने के लिए मजबूर किया जाता है।
कुछ अन्य छात्रों को जलते हुए सिगरेट से दागा जाता है।
बहुत से अन्य छात्रों को नंगा कर अपने साथियों के साथ कुश्ती लड़ायी जाती है !
या अन्य कोई खेल खेलाया जाता है।
इधर कुछ समय से यौन दुरुपयोग की भी खबरें आती रही हैं।
ऐसी यातना अकल्पनीय होती है !और अनेक छात्र अपमानवश आत्महत्या कर लेते हैं।
रैगिंग के मामले इतने भयानक ढंग से उठे हैं कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय को देश भर के शैक्षणिक संस्थानों के लिए कड़े देश निर्देश जारी करना पड़ा है।
रैगिंग का सख्ती से उन्मूलन करना चाहिए।
इसके लिए सख्त कानून बनाने की जरूरत है।
सरकार भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकती।
शिक्षकों और अभिभावकों को छात्रों में करुणापूर्ण प्रवृत्ति जगाना चाहिए।
अगर इस कुप्रथा को आज ही न रोका जाए, तो इससे देश में शैक्षणिक माहौल खराब होगा और होनहार छात्रों का जीवन बर्बाद हो जाएगा।
इस दुश्चक्र को तोड़ना ही पड़ेगा ताकि आज के पीड़ित कल के उत्पीड़क न बन बैठें।

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