वैद्युतचुंबकीय प्रेरण केवल सैद्धांतिक या शैक्षिक रूप से ही उपयोगी परिघटना कहाँ है वरन व्यावहारिक दृष्टि से विद्युत न हो तो विद्युत प्रकाश न हो, ट्रेन हो टेलीफ़ोन न हो और कंप्यूटर न हो।
फैराडे एवं हेनरी के इन पुरोगामी (pioneering) प्रयोगों ने ही आधुनिक जनित्रों एवं ट्रांसफार्मरों के विकास को संभव बनाया। आज की सभ्यता के विकास में वैद्युतचुंबकीय प्रेरण की खोज ने एक अहम भूमिका निभाई है।
6.2 फैराडे एवं हेनरी के प्रयोग वैद्युतचुंबकीय प्रेरण की खोज तथा उसकी समझ फैराडे एवं हेनरी द्वारा किए
गए अनेक प्रयोगों पर आधारित है। हम उनमें से कुछ प्रयोगों का वर्णन यहाँ
प्रयोग 6.1:-
चित्र 6.1 में धारामापी G से जुड़ी हुई एक कुंडली C, दर्शायी गई है।
जब एक दंड चुंबक के उत्तरी ध्रुव को इस कुंडली की ओर धकेला जाता है तो धारामापी का संकेतक विक्षेपित होता है जो कुंडली में विद्युत धारा की उपस्थिति को दर्शाता है।
यह विक्षेप तभी तक रहता है जब तक दंड चुंबक गति में रहता है।
जब चुंबक स्थिर होता है तो धारामापी कोई विक्षेप नहीं दर्शाता। जब चुंबक को कुंडली से दूर ले जाते हैं तो धारामापी विपरीत दिशा में विक्षेप दर्शाता है, जो धारा प्रवाह की दिशा के विपरीत होने को दर्शाता है।
इसके अतिरिक्त, जब दंड चुंबक के दक्षिणी ध्रुव को कुंडली की ओर या इससे दूर ले जाते हैं तो धारामापी में विक्षेप की दिशाएँ उत्तरी ध्रुव की इसी प्रकार की गति की अपेक्षा विपरीत हो जाती हैं।
इसके अतिरिक्त, जब चुंबक को कुंडली की ओर या इससे दूर तेजी से गतिमान किया जाता है तो विक्षेप और इसलिए धारा अधिक प्राप्त होता है।
यह भी देखा गया है कि यदि दंड चुंबक को स्थिर रखा जाए तथा इसके बजाय कुंडली C, को चुंबक की ओर या इससे दूर गतिमान किया जाए तो भी इसी प्रकार का प्रभाव उत्पन्न होता है।
यह दर्शाता है कि कुंडली में विद्युत धारा की उत्पत्ति (प्रेरण) चुंबक तथा कुंडली के मध्य सापेक्ष गति का प्रतिफल है।
प्रयोग 6.2 :-
जोसेफ हेनरी [1797 1878]
जोसेफ हेनरी अमेरिकी प्रायोगिक भौतिक शास्त्री प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर तथा स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के प्रथम निदेशक थे।
लोहे के ध्रुवों के चारों ओर पृथक्कृत दंड चुंबक को स्थिर रखकर तथा इसके स्थान पर तार की कुंडलियों लपेटकर उन्होंने विद्युत चुंबकों में महत्वपूर्ण सुधार किए एवं एक विद्युत चुंबकीय मोटर तथा एक नए दक्ष टेलीग्राफ का आविष्कार किया।
उन्होंने स्वप्रेरण की खोज की तथा इस बात का पता लगाया कि कैसे एक परिपथ में प्रवाहित धारा दूसरे परिपथ में धारा प्रेरित करती है।
चित्र 6.2 :- में दंड चुंबक को बैटरी से जुड़ी हुई एक दूसरी कुंडली , से प्रतिस्थापित किया गया है।
कुंडली C, में अपरिवर्ती धारा अपरिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। जैसे ही कुंडली C को कुंडली C की ओर लाते हैं, धारामापी एक विक्षेप दर्शाता है।
यह कुंडली C, में प्रेरित विद्युत धारा को निदर्शित करता है। जब C, को दूर ले जाते हैं तो धारामापी 2 फिर से विक्षेप दर्शाता है, लेकिन इस बार यह विक्षेप विपरीत दिशा में होता है।
यह विक्षेप तभी तक रहता है जब तक कुंडली C2 गति में रहती है जब यह विक्षेप तभी तक रहता है जब तक कुंडली C, गति में रहती है। जब कुंडली C. को G
जब भी कुंडली या 'लूप' शब्द का उपयोग किया जाता है तो यह मान लिया जाता है कि वे चालक पदार्थों से बने है तथा इन्हें जिन तारों से बनाया गया है उन पर अवरोधक पदार्थों की परत चढ़ी है।
स्थिर रखा जाता है तथा C, गतिमान होता है तो उन्हीं प्रभावों को फिर से देखा जा सकता है। यहाँ भी कुंडलियों के मध्य सापेक्ष गति विद्युत धारा प्रेरित करती हूँ।
प्रयोग 6.3
उपरोक्त दोनों प्रयोगों में चुंबक तथा कुंडली के बीच तथा दो कुंडलियों के बीच सापेक्ष गति शामिल है। एक अन्य प्रयोग द्वारा फैराडे ने दर्शाया कि यह सापेक्ष गति कोई अति आवश्यक अनिवार्यता नहीं है।
चित्र 6.3 में दो कुंडलियाँC, तथा दर्शायी गई हैं जो स्थिर रखी गई हैं। कुंडली C को एक धारामापी G से जोड़ा गया है जबकि दूसरी कुंडली C, को एक दाव-कुंजी K से होकर एक बैटरी से जोड़ा जाता है।
यह देखा जाता है कि दाब-कुंजी K को दबाने पर धारामापी एक क्षणिक विक्षेप दर्शाता है और फिर इसका संकेतक तत्काल शून्य पर वापस आ जाता है।
यदि कुंजी को लगातार दबाकर रखा जाए तो धारामापी में कोई विक्षेप नहीं होता।
जब कुंजी को छोड़ा जाता है तो फिर से एक क्षणिक विक्षेप देखा जाता है, लेकिन यह विक्षेप विपरीत दिशा में होता है।
यह भी देखा गया है कि यदि कुंडलियों में उनके अक्ष के अनुदिश एक लोहे की छड़ रख दी जाए तो विक्षेप नाटकीय रूप से बढ़ जाता है।
6.3 चुंबकीय फ्लक्स:-
फैराडे की विशाल अंतर्दृष्टि के कारण वैद्युतचुंबकीय प्रेरण पर उनके द्वारा किए गए प्रयोगों को श्रृंखला की व्याख्या करने वाले एक सरल गणितीय संबंध की खोज करना संभव हुआ।
तथापि, इसके पहले कि हम वह नियम बताएँ तथा उसकी प्रशंसा में कुछ कहें, हमें चुंबकीय फ्लक्स B की अवधारणा से परिचित हो जाना आवश्यक है।
चुंबकीय फ्लक्स को भी ठीक उसी प्रकार परिभाषित किया जाता है जिस प्रकार विद्युतीय फ्लक्स को अध्याय में परिभाषित किया गया है।
6.4 फैराडे का प्रेरण का नियम :-
प्रायोगिक प्रेक्षणों के आधार पर फैराडे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जब किसी कुंडली में चुंबकीय फ्लक्स समय के साथ परिवर्तित होता है तब कुंडली में विद्युत वाहक बल प्रेरित होता है। अनुभाग 62 में चर्चित प्रायोगिक प्रेक्षणों की इस अवधारणा का उपयोग करके व्याख्या कर सकते हैं।
प्रयोग 6.1 में कुंडली C, की ओर अथवा इससे दूर चुंबक की गति तथा प्रयोग 6.2 में कुंडली C, की ओर अथवा इससे दूर एक धारा वाहक कुंडली C, की गति, कुंडली C की ओर अथवा इससे दूर एक धारा वाहक कुंडली C, की गति, कुंडली C. से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स को परिवर्तित करती है। चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन से कुंडली C में विद्युत वाहक बल प्रेरित होता है।
इसी प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण कुंडली C, तथा धारामापी में विद्युत धारा प्रवाहित होती है। प्रयोग 6.3 में किए गए प्रेक्षणों का एक युक्तियुक्त स्पष्टीकरण निम्न प्रकार है- जब दाब कुंजी K को दबाते हैं तो कुंडली C, में विद्युत धारा (तथा इसके कारण चुंबकीय क्षेत्र) अल्प समय में शून्य से अधिकतम मान तक बढ़ती है।
परिणामस्वरूप, समीपस्थ कुंडली C में भी चुंबकीय फ्लक्स बढ़ता है। कुंडली C, में होने वाले चुंबकीय फ्लक्स के इस परिवर्तन के कारण कुंडली C में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है। जब कुंजी को दबाकर रखा जाता है तो कुंडली C, में धारा स्थिर रहती है।
इसीलिए कुंडली C में चुंबकीय फ्लक्स में कोई परिवर्तन नहीं होता तथा कुंडली C, में धारा शून्य हो जाती है। जब कुंजी को छोड़ते हैं तो कुंडली C. में विद्युत धारा तथा इसके कारण उत्पन्न होने वाला चुंबकीय क्षेत्र अल्प समय में अधिकतम मान से घटकर शून्य हो जाता है।
इसके परिणामस्वरूप कुंडली C," में चुंबकीय फ्लक्स घटता है और इस प्रकार कुंडलो C, पुनः प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
इन सभी प्रेक्षणों में एक सर्वनिष्ठ बात यह है कि में किसी परिपथ में चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन दर के कारण प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।
फैराडे ने प्रायोगिक प्रेक्षणों को एक नियम के रूप में व्यक्त किया जिसे फैराडे का वैद्युतचुंबकीय प्रेरण का नियम कहते है।
इस नियम को निम्न प्रकार से अभिव्यक्त किया गया है।
प्रेरित विद्युत वाहका परिमाण युबकीय पलक्स में समय के साथ होने वाले परिवर्तन की दर के बराबर होता है।
गणितीय रूप में प्रेरित विद्युत धारा को.
ऋणचि को दिशा तथा परिणामतः बंद सूप में धारा की दिशा व्यक्त करता है। इसकी विस्तृत चर्चा हम अगले अनुच्छेद में करेंगे।
पास पास लपेटे हुए N फेरो वाली किसी कुंडली के प्रत्येक फेरे से संबद्ध में एकसान परिवर्तन होता है। इसलिए कुल प्रेरित विद्युत वाहक बल का व्यंजक होगा
लेंज का नियम :- तथा ऊर्जा संरक्षण सन 1834 में जर्मन भौतिकविद हेनरिक फ्रेडरिच लेंज (1804-1865) ने एक नियम का निगमन किया
जिसे लेंज का नियम के नाम से जाना जाता है।
यह नियम प्रेरित विद्युत वाहक बल की ध्रुवता (दिशा) का स्पष्ट एवं क्षिप्त रूप में वर्णन करता है। इस नियम का प्रकथन है!
प्रेरित विद्युत वाहक बल की ध्रुवता (polarity) इस प्रकार होती है कि वह उस दिशा में धारा प्रवाह प्रवृत्त करे जो उसे उत्पन्न करने वाले कारक (चुंबकीय क्षेत्र परिवर्तन) का विरोध करें।
समीकरण (6.3) में ऋण चिह्न इस प्रभाव को निरूपित करता है। अनुच्छेद 6.2.1 के प्रयोग 6.1 का निरीक्षण करके हम लेंज के नियम को समझ सकते हैं।
चित्र 6.1 में हम देखते हैं कि दंड चुंबक का उत्तरी ध्रुव बंद कुंडली की ओर ले जाया जा रहा है। जब दंड चुंबक का उत्तरी ध्रुव कुंडली की ओर गति करता है तब कुंडली में चुंबकीय फ्लक्स बढ़ता है।
इस प्रकार कुंडली में प्रेरित धारा ऐसी दिशा में उत्पन्न होती है जिससे कि यह फ्लक्स के बढ़ने का विरोध कर सके। यह तभी संभव है जब चुंबक की ओर स्थित प्रेक्षक के सापेक्ष कुंडली में धारा वामावर्त दिशा में हो।
ध्यान दीजिए, इस धारा से संबद्ध चुंबकीय आघूर्ण की ध्रुवता उत्तरी है जबकि इसकी ओर चुंबक का उत्तरी ध्रुव आ रहा हो। इसी प्रकार, यदि कुंडली में चुंबकीय फ्लक्स घटेगा। चुंबकीय फ्लक्स के इस घटने का विरोध के लिए कुंडली में प्रेरित धारा दक्षिणावर्त दिशा में बहती है !
तथा इसका दक्षिणी ध्रुव दूर हटते दंड चुंबक के उत्तरी ध्रुव की ओर होता है। इसके फलस्वरूप एक आकर्षण बल काम करेगा जो चुंबक की गति तथा इससे संबद्ध फ्लक्स के घटने का विरोध करेगा।
उपरोक्त उदाहरण में यदि बंद लूप के स्थान पर एक खुला परिपथ उपयोग किया जाए तो क्या होगा?
इस दशा में भी, परिपथ के खुले सिरों पर एक प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होगा। प्रेरित विद्युत वाहक बल की दिशा लेंज के नियम का उपयोग करके ज्ञात की जा सकती है।
चित्र 6.6 (a) तथा (b) पर विचार करें ये प्रेरित धाराओं की दिशा को समझने के लिए एक सरल विधि सुझाते हैं।
ध्यान दीजिए कि ३ तथा द्वारा दर्शायी गई दिशाएँ प्रेरित धारा की दिशाएँ निरूपित करती हैं।
इस विषय पर थोड़े से गंभीर चिंतन से हम लेंज के नियम की सत्यता को स्वीकार कर सकते हैं।
माना कि प्रेरित विद्युत धारा की दिशा चित्र 6.6(a) में दर्शायी गई दिशा के विपरीत है। उस दशा में प्रेरित धारा के कारण दक्षिणी ध्रुव पास आते हुए चुंबक के उत्तरी ध्रुव ओर होगा।
इसके कारण दंड चुंबक कुंडली की ओर लगातार बढ़ते हुए त्वरण से आकर्षित होगा। चुंबक को दिया गया हलका-सा धक्का इस प्रक्रिया को प्रारंभ कर देगा तथा बिना किसी ऊर्जा निवेश के इसका वेग एवं गतिज ऊर्जा सतत रूप से बढ़ती जाएगी।
यदि ऐसा हो सके तो उचित प्रबंध द्वारा एक शाश्वत गतिक मशीन (perpetual motion machine) का निर्माण किया जा सकता है।
यह ऊर्जा के संरक्षण नियम का उल्लंघन है और इसीलिए ऐसा नहीं हो सकता।
अब चित्र 6.6(a) में दर्शायी गई सही स्थिति पर विचार करें। इस स्थिति में दंड चुंबक प्रेरित विद्युत धारा के कारण एक प्रतिकर्षण बल का अनुभव करता है।
इसलिए चुंबक को गति देने के लिए हमें कार्य करना पड़ेगा। हमारे द्वारा खर्च की गई ऊर्जा कहाँ गई? वह ऊर्जा प्रेरित धारा द्वारा उत्पन्न जूल ऊष्मन के रूप में क्षयित होती है।


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