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चिकित्सा एवं मानव स्वास्थ्य में जैव प्रौद्योगिकी के उपयोगों का वर्णन करें। (Describe the biotechnological applications in medicine and human health.)(10+2)


Ans. आजकल पुनर्योगज डीएनए तकनीक के प्रयोग से अत्यंत सुरक्षित एवं अत्यधिक प्रभावी चिकित्सकीय औषधियों का निर्माण हो रहा है।

 इन औषधियों का अवांछित प्रतिरक्षात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। वर्तमान समय में लगभग 30 पुनयोगज चिकित्सीय औषधियां मनुष्य में प्रयोग के लिए स्वीकृत हो चुकी है। 

इनमें से 12 औषधियों का भारत में विपणन हो रहा है।

आनुवंशिक रूप से निर्मित इंसुलीन - ह्युमुलीनमनुष्य का इंसुलीन दो छोटी पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं का बना होता है।

 इन्हें श्रृंखला-ए तथा श्रृंखला-बी कहते हैं। ये दोनों श्रृंखलायें आपस में द्विसल्फाइड बंधन से जुटे होते हैं।

 इंसुलिन का स्त्राव प्राक् हॉर्मोन के रूप में होता है, स्राव के बाद यह पूर्ण परिपक्व तथा क्रियाशील बनता है। 

प्राक् हॉर्मोन में एक और पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला होती है, जिसे श्रृंखला-सी कहते हैं।

 यह श्रृंखला इंसुलिन के परिपक्व होने के समय अलग हो जाती है। 

सन् 1983 ई. में अमेरिका की एक कंपनी एली लिली ने दो ऐसे डीएन एक श्रृंखलाओं का संश्लेषण किया जो इंसुलीन के पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाए तथा बी का संश्लेषण कर सकें। 

इन दोनों डीएनए श्रृंखलाओं को ई. कोलाई के प्लाजमिड में प्रवेशकराकर इंसुलीन का उत्पादन किया। 

इन दोनों श्रृंखलाओं को निर्माण के पश्चात द्विसल्फाइड बंधन द्वारा जोड़कर मानव इंसुलीन का निर्माण किया गया।

 इसे ह्यूमुलीन कहा गया। जीन चिकित्सा: जीन चिकित्सा प्रक्रिया में व्यक्ति की कोशिकाओं एवं उत्तकों में जीनों को प्रवेश कराकर आनुवांशिक दोषों को दूर किया जाता है।

 इसमें सामान्य जीनको व्यक्ति या भ्रूण में स्थानांतरित कराकर निष्क्रिय अथवा उत्परिवर्तित जीन को क्षतिपूर्तिकर उसके कार्य को संपन्न कराया जाता है। 

वैसे विषाणु जो परपोषी में अपने आनुवंशिकपदार्थों को प्रवेश कराते हैं, उनका उपयोग जीनों के संवाहक के रूप में किया जाता है।

जीन चिकित्सा का पहला सफल प्रयोग सन् 1990 ई. में एक चार वर्षीय लड़की में एडीनोसीन डिएमीनेज (ADA) की कमी को दूर करने के लिए किया गया था।

 एडीए की कमी का उपचार अस्थिमज्जा के प्रत्यारोपण या एंजाइम प्रतिस्थापन विधि के द्वारा होता है, किन्तु ये दोनों ही विधि पूर्णतः रोगनाशक नहीं है।

जीन चिकित्सा पद्धति में सर्वप्रथम रोगी के लसीकाणु का निकालकर शरीर से बाहर संबंधित किया जाता है।

 सक्रिय एडीए का सी डीएनए पश्च विषाणु द्वारा लसीकाणु में प्रवेश कराया जाता है। पुनः इस लसीकाणु को रोगी के शरीर में डाल दिया जाता है। 

चूंकि ये लसीकाणु मृतप्राय होती है, अतः समय-समय पर इन आनुवंशिक निर्मित लसीकाणुओं को रोगी के शरीर से बाहर निकालना पड़ता है। 

यदि मज्जा कोशिकाओं से विलगित अच्छे जीन को प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था कीकोशिकाओं में प्रवेश करा दिया जाये तो यह स्थायी उपचार हो सकता है।



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