प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है:-
(i) सहज प्रतिरक्षा
(ii) उपार्जित प्रतिरक्षा ।
प्रतिरक्षा करने के उपाय :(i) रोगग्रस्त होने पर किसी रोग से पीड़ित व्यक्ति को उस बीमारी के खिलाफ आजीवन प्रतिरक्षा प्राप्त कर लेता है, जैसे- चेचक, खसरा, या गलसुआ।
(ii) टीकाकरण द्वारा:- पोलियो, तपेदिक, यकृतशोथ, इत्यादि जैसी बीमारियों के खिलाफ टीके लगवा कर"
टीके क्षीण किए रोगाणु हैं। जब ये शरीर में प्रवेश करते हैं तो रोगों के खिलाफ शारीरिक प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं लेकिन रोग नहीं पैदा करते।
" कई संक्रामक रोगों को फैलाने से रोकने के लिए टीकों द्वारा प्रतिरक्षाकरण अत्यधिक कारगर ढंग है।
लकवा, चेचक, टिटनेस, पतले दस्त, काली खाँसी, तपेदिक और विभिन्न प्रकार के यकृतशोथों के खिलाफ टीके उपलब्ध हैं।
आजीवन प्रतिरक्षा के लिए अधिकतर प्रतिरक्षण को कम उम्र में प्रदान किया जाना चाहिए।•
टीकाकरण में रोगजनक या निष्क्रिय या दुर्बलीकरण रोगजनक को शरीर में प्रवेश कराया जाता है।
इन रोगजनक या निष्क्रिय या दुर्बलीकरण रोगजनक के विरुद्ध शरीर में प्रातरक्षियों का निर्माण होता है।
जो बी-कोशिका एवंअभी स्मृति कोशिकाओं का निर्माण करते हैं। ये कोशिकाये वास्तविक संक्रमण
के दौरान रोजन कारकों को निष्प्रभावी बना देते हैं। •
घातक रोगाणुओं से संक्रामण के दौरान प्रतिरक्षियों की आवश्यकता होती है।
इस स्थिति में प्रभावकारी निष्पादित प्रतिरक्षियो या प्रतिआविष को टीका के रूप में शरीर में प्रवेश कराया जाता है।
इसे निष्क्रिय प्रतिरक्षीकरण कहते हैं। जैसे टेटनस एवं साँप द्वारा कांटे जाने की स्थिति में।
आज कल पुनर्योगज डी०एन०ए० प्रौद्योगिकी द्वारा वाणु में रोगजनको के विरुद्ध प्रतिजन पौलिपेप्टाईड का उत्पादन होने लगा है।
जैसे-हिपेटाइटिस बी के विरुद्ध टीका का उत्पादन इस तकनीक द्वारा खमीर में किया जाता है।

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