उनके विद्यालय के दिन सतारा में औरमहाविद्यालय के दिन मुम्बई में बीते। उन्होंने एलिफिन्स्टन हाईस्कूल और एलिफिन्स्टनकॉलेज में अध्ययन किया।
उन्हें बड़ौदा के महाराज की ओर से छात्रवृत्ति मिली जिनकी उन्होंने बाद में नौकरी की, लेकिन तुरन्त अस्पृश्यता के दंश के कारण छोड़ना पड़ा।
उन्होंने गायकवाड़ छात्रवृत्ति पर कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से एम. एस. सी. (अर्थशास्त्र) प्राप्त की। उन्होंने जर्मनी में डी.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने वकील, कारोबारी, प्राध्यापक और परामर्शदाता का काम किया लेकिन व्याप्त अस्पृश्यता के कारण सबमें विफल रहे।
उन्होंने गाँधीजी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने कई अन्य पदों पर काम किया।
लेकिन भारतीय संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्हें प्रसिद्धि मिलो। वे नेहरू के मंत्रिमण्डल में कानूनमंत्री बने थे।
भीमराव ने अम्बेदकर पदवी अपने आदरणीय शिक्षक के नाम के आधार पर अपनाया। उनकी शादी 1904 में रमाबाई से और 1948 में डॉ. शारदा कबीर से हुई थी। उन्होंने 5 दिसंबर 1956 को अंतिम साँस ली। जौवन के लगभग आखिरी समय में उन्होंने बौद्धधर्म अपना लिया था जो हिन्दू जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करता।भीमराव को अस्पृश्यता के कारण बहुत कष्ट उठाना पड़ा जिससे वे जीवनभर लड़ते रहे।
उन्होंने स्त्री-पुरुषों की समान शिक्षा और आदर की जरूरत पर जोर दिया। वे समानता एवं सर्वप्रथम समभाव और विश्ववन्धुत्व में विश्वास करते थे। उन्होंने दलित और वचत वर्गों को ऊँचा उठाने के लिए बहुत संघर्ष किया। दुःख की बात है कि व्यक्तिगत तौर पर संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए अम्बेदकर के पवित्र नाम का नाजायज इस्तेमाल किया जा रहा है।
हम एक तरह का विपरीत भेदभाव पाते हैं जिसके वे विरोधी थे और जिसे वे भारतीय समाज से उखाड़ फेंकना चाहते थे। भारतीय लोग अपने राष्ट्रीय जीवन में शानदार योगदान के लिए उनके बेशक बहुत कृतज्ञ हैं, लेकिन उनकी आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब हम उनके सपनों के वर्गविहीन और जातिविहीन भारतीय समाज की स्थापना कर लेंगे।

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