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राष्ट्रभाषा और राजभाषा से आप क्या समझते हैं



राष्ट्रभाषा और राजभाषा में निम्नलिखित अंतर है :-

 साधारणतया राष्ट्रभाषा का अर्थ राष्ट्र की भाषा होता है। इस अर्थ में आलोक राष्ट्र के भीतर जितनी भी भाषाएँ हैं, सभी राष्ट्रभाषाएँ हैं। भारत के संविधान की आठवीं सूची में आबद्ध 19 भाषाओं (मैथिली समेत) के अतिरिक्त देश की दर्जानाधिक अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ, जो अपने-अपने क्षेत्र विशेष में लोक-संप्रेषण के माध्यम हैं, भारत की राष्ट्रभाषाएँ हैं। 


कारण स्पष्ट है कि भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नाम से किसी एक भाषा का उल्लेख नहीं हुआ है। संविधान में राजभाषा, संघभाषा अथवा सम्पर्क भाषा जैसे शब्दों का ही प्रयोग हुआ है। बावजूद इसके समग्र विशिष्ट राष्ट्रभाषा की कल्पना और उसकी यथार्थता से भारतवासी मुकर नहीं सकते कि इस यथार्थता का हक अपनी स्थिति के कारण हिन्दी है।





यथार्थ है कि राजभाषा अथवा संपर्क भाषा अपनी एक सीमा से आबद्ध है। परन्तु इस परिधि की सीमा के दोनों पार व्यापक आयामों में परिव्याप्त, राष्ट्र के प्रशासन, समस्त दैनिक एवं विशेष कार्य-व्यापार व्यवसाय, रीति-नीति, तकनीक एवं संस्कृति एवं परम्परा को अभिव्यक्ति देने वाली व विश्व के विभिन्न देशों के भीतर तक पहुंचाने में समर्थ राष्ट्र की एक सुगम, सुबोध एवं सशक्त भाषा राष्ट्रभाषा होती है। राष्ट्रभाषा को परिभाषित करने के संदर्भ में कहा जा सकत है कि राष्ट्रभाषा वह भाषा है जो समस्त राष्ट्र में फैली हो।


 राष्ट्रभाष के रूप में हिन्दी के सम्बन्ध में आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा का कथन है— "हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहने पर यह आपत्ति उठाई गई है कि भारत की अनेक भाषाओं की तुलना में उसे अधिक गौरव दिया जा रहा है। यदि हिन्दी राष्ट्रभाषा कहलाने की अधिकारिणी है तो वह अधिकार भारत की अन्य भाषाओं को भी है क्योंकि वे भी राष्ट्र की ही भाषाएँ हैं।" 


आगे डॉ. शर्मा ने इस प्रश्न का समाधान भी इस रूप में प्रस्तुत किया है- "पहली बात तो यह है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहने वाले उसे कोई गौरव प्रदान करने की भावना से ऐसा नहीं करते और न अन्य भाषाओं को उसकी तुलना में हीन बताने की भावना से। वस्तुतः राष्ट्रभाषा इसलिए नहीं कहा गया कि वह राष्ट्र की एकमात्र या सर्वप्रमुख भाषा है, बल्कि इस नाम का प्रयोग अंग्रेजी को ध्यान में रखकर किया गया। ...



 स्वाधीनता संग्रम के समय नेताओं ने प्रत्येक दृष्टि से स्वदेशीपन या यों कहें कि राष्ट्रीयता की भावना जगाने की कोशिश की। यह नाम उसी प्रसंग में सामने आया। अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा को छोड़कर अपनी भाषाओं के प्रति उन्मुख होना चाहिए, यह उस आन्दोलन का अनिवार्य लक्ष्य था। 


इसलिए कांग्रेस ने कानपुर अधिवेशन (1825 ई.) में यह प्रस्ताव स्वीकृत किया कि अपने सभी कार्यों में प्रादेशिक कमेटियाँ, प्रादेशिक भाषाओं अथवा हिन्दुस्तानी (हिन्दी का) प्रयोग करें और अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी का प्रयोग हो।


अतः समस्त राष्ट्र के लिए जो भाषा संपर्क स्थापित करने का कार्य कर सके उसे राष्ट्रभाषा कहने में कोई हानि या आपत्ति नहीं हैं।




सच्चाई है कि राष्ट्रभाषा राष्ट्र की वह भाषा होती है जो अपने व्यापक परिवेश एवं विकासोन्मुख प्रवर्धमान शक्तियों के कारण अपनी क्षेत्रीयता की सीमा से उठते हुए देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के संवेदन-स्पंदन को अपनी आत्मा में समेट कर उसे अभिव्यक्त करती है एवं जो भिन्न-भिन्न क्षेत्रों एवं पृथक्-पृथक् भाषा-भाषियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने 'मैं' पुल का काम करती है। 


हिन्दी इन दोनों दायित्वों का अबाध निर्वाह कर रही है। इसीलिए इसकी राष्ट्रभाषा के रूप में समवेत प्रतिष्ठा किसी सायास प्रयास नहीं बल्कि सहज स्फूर्त गति का प्रतिफल है। डॉ. इन्द्रचन्द्र शास्त्री ने अपने निबन्ध 'राष्ट्रभाषा और हिन्दी में लिखा है — "हिन्दी का वाहन पक्ष अत्यन्त शक्तिशाली है। भारत की कोई ऐसी भाषा नहीं है, जिसे इतने आदमी बोलते हों। समझने वालों की संख्या तो और भी अधिक है। पंजाबी, बंगाली, गुजराती तथा दक्षिणी लोग हिन्दी नहीं।बोलते। 


फिर भी समझते सभी हैं। इस दृष्टि से हिन्दी को ही राष्ट्र भाषा प्रयोजनमूलक बनने का अधिकार है।" (राजभाषा भारती, अंक-32) राष्ट्रभाषा की स्थिति को प्रांजल करते हुए मुरारीश्याम वर्मा ने अपने लेख 'हिन्दी - राष्ट्रभाषा नीति और कसौटी' में लिखा है, हिन्दी एक जीवित और सबल भाषा है जो शताब्दियों की सरकारी उपेक्षा में भी पनपती रही है। 

शुद्धे भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता तथा शैक्षणिक उपयोगिता की दृष्टि से वह राष्ट्रभाषा की कसौटी पर खरी उतरती है।" (राजभाषा भारती, अंक-23 ) वस्तुतः राष्ट्रभाषा वह लोकभाषा है जो अपनी मातृभाषिक सीमा से उठकर अपनी शक्ति एवं व्यापकता के परिवेश में राष्ट्र के भीतर एवं बाहर की विविध भाषाओं से अपने को पुष्ट और मांसल करती हुई राष्ट्र की विविध परंपराओं,

 संस्कृतियों, आचार व्यवहारों, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक-व्यवसाय आदि समस्त अनुशासनिक शब्दावलियों, संस्कारों से अभिसिक्त कर देश के सांस्कृतिक कार्यकलापों को गति और अभिव्यक्ति देने में समर्थ हो व विश्व के सामने अपने राष्ट्र को संपूर्णता के साथ रखने में सक्षम हो। यू.एस.एस. आर. की रूसी भाषा की भाँति ही

 संघीय जनतंत्र भारत में यह कार्य हिन्दी के जिम्मे है और वह यह कार्य बखूबी कर रही है। हिन्दी की इस गरिमापूर्ण स्थिति के पीछे हिन्दी के विकास का दीर्घ इतिहास एवं उससे जुड़े भारत के महान् स्वतंत्रता सेनानियों, महापुरुषों, संतों एवं राजनीतिज्ञों का भी काफी योगदान अवरेखित किया जा सकता है।

परिणामतः राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा पाने से काफी समय पूर्व से ही हिन्दी विराट् जन-मानस के भावों एवं विचारों की संवाहिका बन चुकी थी। इस बात की पुष्टि अंग्रेज विद्वान् टामस कोल ब्रूक एवं संस्कृत के अंग्रेज विद्वान् हेनरी के कथन से होती है-जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रांत के लोग करते हैं, जो पढ़े लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है और जिसको प्रत्येक गाँव में थोड़े-बहुत लोग अवश्य



 समझ लेते हैं, उसी का यथार्थ नाम हिन्दी है सच है कि यह हिन्दी सहज बोधगम्यता एवं रूप परिव्याप्त सांस्कृतिक परिवेश से युक्त मुगलों, देशी राजे-रजवाड़ों एवं बाद में अंग्रेज शासक काल में देश के विविध क्षेत्रों को जोड़ने, उनके बीच भावों एवं विचार-विनिमय का माध्यम तो रही ही साथ ही सरकारी तंत्र के संचालन में भी व्यवहत होती रही। 




कारण स्पष्ट है कि स्वतंत्रता की लड़ाई तक पहुँचते-पहुँचते यह भाषा इतनी सशक्त, समृद्ध एवं व्यापक हो गई कि अनेक अहिन्दी भाषी राष्ट्रनेताओं ने इसे राष्ट्रव्यापी आंदोलन के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया एवं भारत की आजादी के उपरान्त इसे राष्ट्र के पुनरोत्थान में संघ की राजभाषा राज्यों के बीच, एवं केन्द्र एवं राज्यों के मध्य व विविध क्षेत्रों के लोगों के बीच आपसी विचार-विनिमय का माध्यम बनाया।



निश्चित तौर पर आज हिन्दी राष्ट्रभाषा के दायित्व को निष्ठापूर्वक निभा रही है। हिन्दी में भाषा और साहित्य ही नहीं विज्ञान, शिक्षा-शास्त्र, चिकित्साशास्त्र, अभियांत्रिकी, विधि, कृषि, उद्योग, प्रौद्योगिकी आदि सभी विषयों की पुस्तकें उपलब्ध हैं और इनके पठन-पाठन के रूप में भी हिन्दी का बहुआयामी प्रयोग हो रहा है। 



प्रशासन, रक्षा, यांत्रिक, चिकित्सा एवं प्रौद्योगिक क्षेत्रों में तो हिन्दी के प्रयोग पूर्व से ही हो रहे हैं। इस प्रकार देखा जा रहा है कि राष्ट्रीय जीवन की सभी दिशाओं एवं विधाओं में हिन्दी का व्यापक व्यवहार हो रहा है एवं हिन्दी इन्हें वहन करने में सर्वतोभावेन समर्थ एवं तत्पर है। हिन्दी का यह संपूर्ण संवाहक स्वरूप राष्ट्रभाषा के पुष्ट स्वरूप की सार्थकता का परिचायक है।



                           राजभाषा



राजभाषा हिन्दी पर विचार करने से पूर्व उसकी पूर्व पीठिका पर विचार करना आवश्यक है। ज्ञात है कि हिन्दी का एक अंश राजभाषा के रूप में मुगलकाल से ही पहले प्रयुक्त होता था। मुहम्मद गौरी के सिक्कों पर देवनागरी लिपि का प्रयोग हुआ है। शहाबुद्दीन (1192 ई.) के द्वारा भी ब्रजमिश्रित भाषा का व्यवहार किया गया प्रयो है। कहा जाता है कि ऊपरी तौर पर मुगलकाल के शासन की भाषा फारसी थी, परन्तु सह-राजभाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग किया जाता था। 


राजभाषा के रूप में मराठा राज्य में भी हिन्दी का प्रयोग हुआ। इस संदर्भ में डॉ. कैलाशचन्द्र भाटिया का कथन अवलोकनीय है-- "राजस्थान की विभिन्न रियासतों में तो पूरा पत्राचार हिन्दी में होता था। ग्वालियर नरेश महाराज जयाजीराव सिंधिया ने दीवान शेख गुलाम हुसैन को 21-11-1853 को यह आज्ञा प्रचारित की कि फारसी शब्दों का प्रयोग करने पर दण्ड की व्यवस्था है। 


बीकानेर के महाराज ने सन् 1872 में सर टामस जार्ज बेरन नाथ ब्रुक तक को हिन्दी में पत्र लिखा। सन् 1807 में अलवर में उर्दू के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग का राज्यादेश निकाला गया।"

अत: निर्णीत है कि संपूर्ण राजस्थान की रजवाड़ों के कामकाज की भाषा हिन्दी थी. निःसंदेह स्थानीय बोलियों एवं भाषाओं का उसमें प्रभाव रहा है। आगे उनका कथन है- "हिन्दी क्षेत्र से इतर देशी राज्यों में भी हिन्दी को प्रश्रय मिला था। बड़ौदा नरेश की आज्ञा से 'सयाजी शासन शब्द कल्पतरु' शीर्षक से प्रशासन शब्दकोष तैयार
 किया गया। 


उस शब्दकोश में गुजराती, मराठी, फारसी के अतिरिक्त हिन्दी रूप भी दिये गये हैं। अंग्रेजी सरकार की हिन्दी विरोधी नीति के बावजूद शनैः-शनै प्रशासन, विधि एवं न्याय के क्षेत्रों में भी हिन्दी के व्यवहार को अमली जामा पहनाने के लिए चरण उठाये गये। 

देश के स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त राजभाषा के क्षेत्र में आंशिक प्रयोग की भाषा हिन्दी हमारे राष्ट्र नायकों द्वारा संघ की भाषा के रूप में संविधान और देश के गौरवपूर्ण स्थान की अधिकारिणी बनी। 

हिन्दी अपने विपुल सामर्थ्य के कारण ही अपने इन विभिन्न रूपों में भारत के विस्तृत भूगोल के जनमानस का सहज संवेदना का माध्यम बनने का गौरव पा सकी है परन्तु हिन्दी का एक और भी स्वरूप है जो आज के कल्याणकारी प्रशासकीय तंत्र में प्रजातंत्र में महती भूमिका का निर्वाह करता है। वह अहम स्वरूप हिन्दी का राजभाषा होना है।






वस्तुत: राजभाषा का अर्थबोध राजकाज प्रशासन तंत्र के कार्य सम्पादन की गतिविधि की भाषा के रूप में होता है। जिस प्रकार प्रत्येक देश के प्रतीक स्वरूप झण्डे का प्रयोग होता है एवं उसे राष्ट्रीय झंडा के नाम से पुकारा जाता है उसी प्रकार हर देश की समग्रता की अभिव्यक्ति माध्यम के रूप में सार्वदेशिक स्वरूप धातू एक भाषा भी होती है। 


उसी भाषा को राजभाषा की संज्ञा दी जाती है। परन्तु ऐसे संधीय देशों में जहाँ देश के पृथक्-पृथक् राज्यों में भिन्न भिन्न राजभाषाएँ है वह भाषा संघ की राजभाषा होती है। वह भाषा आमतौर पर पूरे देश में परस्पर पृथक्-पृथक् भाषा-भाषियों के बीच सम्पर्क माध्यम का जिम्मा तो लेती ही है साथ ही देश की शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, रीति-नीति एवं संस्कृति आदि सभी कार्य व्यापारों का निर्वहन भी करती है। 


इस संदर्भ में आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा का कथन द्रष्टव्य है- "राजभवन के समान ही राजभाषा भी निरीह शब्द है। इसका अर्थ केवल राजकीय भाषा अर्थात् राजकाज की भाषा है।"

डॉ. कैलाशचन्द्र भाटिया की दृष्टि में-"राजभाषा का सामान्य अर्थ है-राजकाज चलाने की भाषा अर्थात् 
भाषा का वह रूप जिसके द्वारा राजकीय कार्य 
चलाने में सुविधा हो।"

आचार्य देवेन्द्र नाथ शर्मा की दृष्टि में राजभाषा के प्रयोग क्षेत्र में शासन, विधान, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका भी शामिल है। डॉ. शर्मा की मान्यता है कि आजादी से पूर्व इन चारों क्षेत्रों में जहाँ अंग्रेजी का प्रयोग अनिवार्य था, अब स्वातत्र्योत्तर भारत में अंग्रेजी की जगह हिन्दी का प्रयोग हो रहा है।

इस सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि भारत संघ के राज्यों की अपनी-अपनी भिन्न-भिन्न राजभाषाएँ हैं, जो राज्य के राजकाज में व्यवहृत होती हैं। इस प्रकार भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल भारत की 19 भाषाएँ देश की राजभाषाएँ हैं। 

परन्तु ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि पूरे भारत को दृष्टिपथ में रखकर जब हम राजभाषा की चर्चा करते हैं तो उसका अर्थ संघ की राजभाषा से लगता है। भारत के संदर्भ में राजभाषा के माध्यम से प्रशासनिक



कार्यों, संघ और राज्यों के बीच सम्पर्क एवं भारत का दूसरे देशों के साथ राजनयिक सम्बन्ध एवं आपसी आदान-प्रदान के रूप में व्यवहृत होता है। यही हिन्दी भारत संघ की राजभाषा है। भारतीय संविधान में राजभाषा के लिए देवनागरी लिपि का होना भी 
अनिवार्य बतलाया गया है।







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